
स्त्रियाँ लड़ती नहीं हैं,
वे तो संवाद के अवशेषों में
अपने ही अस्तित्व की
स्वीकृति खोजती हैं।
उनके प्रश्न
तलवार नहीं होते,
वे तो स्नेह से भीगे
अनकहे निवेदन होते हैं,
जो बार-बार
उपेक्षा की देह से
टकराकर लौट आते हैं।
जब वे ऊँचा बोलती हैं,
तो समझिए—
मौन ने उन्हें
कई बार ठुकराया है।
क्योंकि जिसे
सुना नहीं गया,
वही अंततः
सुने जाने के लिए
स्वर को तीक्ष्ण करता है।
पुरुष
तर्क की शरण में
भावों का अनादर करता है,
वह हर आँसू में
कारण खोजता है,
जबकि वहाँ
केवल अपनत्व
चाह रहा होता है।
स्त्री का क्रोध
विरक्ति नहीं,
वह तो प्रेम का
अंतिम संस्कार नहीं हुआ
एक जीवित आग्रह है—
“मुझे अब भी
अपने जीवन में
स्थान दो।”
वह बार-बार
अपने ही समर्पण की
पुनर्परीक्षा देती है,
और हर बार
अंकपत्र में
शून्य अंक पाती है।
फिर एक दिन
वह प्रश्न पूछना
छोड़ देती है,
क्योंकि उत्तर
पहले ही
अनुपस्थित हो चुके होते हैं।
और पुरुष
इस मौन को
संतुलन समझ बैठता है,
जबकि वह
स्त्री के भीतर
ढहते हुए
एक पूरे संसार की
ध्वनि-हीन कथा होती है।
जिस दिन स्त्री
माँगना छोड़ती है,
उस दिन वह
हारती नहीं—
मुक्त होती है।
और जब तक
पुरुष यह समझ पाता है
कि वह संघर्ष नहीं,
सिर्फ़ स्वयं को
तुम में बचाए रखने की
याचना थी—
तब तक
समय
संबंध से
कहीं आगे निकल
चुका होता है।




