साहित्य

बाल धूप में नहीं सफ़ेद किए

विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

बुजुर्ग कहते हैं कि मैने धूप में बाल
नहीं सफ़ेद किए हैं, अर्थात् उनका
बेशक़ीमती अनुभव उनकी उम्र के
बिताये बेशक़ीमती वक्त से मिला है।

वक्त की धूप में कोई चीज़ पकी हुई
होती है तो अधिक क़ीमती हो जाती है,
किसमिस की क़ीमत इसीलिये अंगूर
की बेल में लगे अंगूरों से ज़्यादा होती है।

जीवन में रिश्तों में समस्यायें बात
करने के अन्दाज़ की वजह से आती हैं,
लहजा सुधार कर बातें की जायँ
तो बिगड़ते रिश्ते भी सुधर जाते हैं।

हमारे शब्द दर्पण के समान होते है
इन्हें उछालकर नहीं चलना चाहिये,
जीवन सरलता से जीने के लिए है,
इसे अदब के साथ ही जीना चाहिए।

जीवन का मक़सद ही सरलता है,
इसे इसी मक़सद से जीना चाहिए,
स्वयं भी यह मक़सद सम्भालना है,
औरों को भी इसे संभलवाना चाहिए।

जब किसी प्रकार का अन्धविश्वास
शिक्षा, संस्कार व ज्ञान को प्रभावित
करने लग जाय तब यह मानसिक
रूप से परतंत्रता के लक्षण होते हैं।

अक्सर हम एक दूसरे के जीवन को
जाने अनजाने प्रकाशित भी करते हैं,
वैसे ही दूसरों के जीवन में अंधेरा भी
जाने अनजाने में ही फैलाते रहते हैं ।

आदित्य जब तक जीवन में अंधकार है,
तब तक निराशा आशा पर हावी होती है,
अंधेरे को चीर कर जीवन में प्रकाश
आता है तब सब जगमग हो जाता है।

विद्यावाचस्पति डा० कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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