
तुम्हारे नन्हे हाथों की
छुवन याद करते हुए
मैं अपना बुढ़ापा
संवार लेता हूँ
ख़ुद को झूठी तसल्ली
देकर मना लेता हूँ।
तुम अब नहीं हो पास मेरे
तुम अब नहीं हो साथ मेरे
तुम्हारी यात्रा बाकी है अभी
मेरी शेष होने को आई है
मैं अकेला अतीत में ढूंढता
तुम्हारा बचपन अपनी बाहों में
दर्द अपना दबा लेता हूँ
ख़ुद को झूठी दिलासा
देकर मना लेता हूँ।
जो बोया था कभी मैंने
वही फ़सल अब काट रहा
किसी अपने से दूर जाने का
दर्द अब मैं ख़ुद से बांट रहा
किसी की पनीली आँखें
ढूंढते हुए मुझे पथरा गई
किसी की आह मेरे
प्रेम का पौधा सुखा गई
सूखे हुए पत्तों से मैं
अश्क पोंछ लेता हूँ।
कमज़ोर होती नज़रों से
तेरा दूर जाता हुआ
अक्स देखता हूँ।
©संजय मृदुल




