
फागुन अपने रंग में, रंगे धरणी चित्त।
रखे सहज आहार ज्यों ,रहे संतुलित पित्त।।
सूखे पत्ते ने कहा ,हुआ हमारा अंत ।
बारी अब नव पात का, कहता झूम बसंत।।
सृष्टि सृजन के क्रम में, बदले कितने रंग।
साथ ढले ज्यों हर घड़ी, सीखे जीवन ढंग।।
मुरझाए हर पात का, न रहा कोई छोर।
हवा संग उड़ता रहा, इत -उत ही बिन डोर।।
कल जो झूमा डाल पर, आज रहा बेहाल ।
टूटा ज्यों बस शाख से , लिपट गया त्यों काल।।
भरा हुआ है प्रश्न से, जीवन का हर मोड़।
उत्तर अपने हाथ में, चिंता करना छोड़।
पावन फागुन मास से, सीखो जीवन सार।
जन्म -मरण के चक्र में,फँसना है बेकार।।
फागुन है रंगीन बस, प्रेम मिलन का मास।
दुख को सुख का रूप दे, नित्य भरे हैं श्वास।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




