साहित्य

फागुन आया

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

रंग बिरंगा फागुन आया, खेल रहे सब होली।
गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।।

नीले पीले लाल गुलाबी,कई रंग है दिखते।
आपस में सब मस्ती करके, प्रेम भाव हैं सिखते।।
एक दूसरे से बोल रहें हैं, प्यारी मधुरिम बोली।
गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।।

बच्चे सब हुड़दंग मचाते करते हैं मनमानी।
साराबोर सब रंगों से हैं, कोई दिखे न सानी।।
उड़ता कहीं गुलाल कहीं पर होती हंँसी ठिठोली।
गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।।

मिल-जुल कर सब खाते हैं, गुझिया और मिठाई।
ढोल मृदंग मंजीरा बाजे, घर-घर खुशियांँ छाई।।
ऊंँच-नीच का भाव भूल कर बन जाते हम जोली।
गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।।

चहुँ दिसि में मादकता फैली, बहती हवा नशीली।
अलसी चना छमाछम बजते,फूली सरसों पीली।।
नव पल्लव भी विहंँस रहे हैं, दिखते ज्यों रंगोली।
गली-गली में घूम रही है, हुरियारों की टोली।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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