साहित्य

गंगा गीत

डॉक्टर संदीप कुमार सचेत

युगों-युगों से बहती है, पावन गंगा की धारा।
लाख करोड़ों जन को इसने, है सदियों से तारा।

नदियों से जीवन पाती धरती, हरा -भरा है जंगल
हरने वाली सबका संकट, करती जीवन का मंगल
इसके अविरल दिव्य तेज से, पावन घर और द्वारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा

गंगा से ही ऋषि -मुनियों ने, तप का बल है पाया
निर्बल ने भी इस जल से ,जीवन का संबल पाया
माता बनकर इस गंगा ने , पापों से दिया छुटकारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा ।

जीवन अमृत बनकर बहती,यह तो है सदियों से
धारा -धारा मिली नदी से, नदी मिली नदियों से
सरस बनाकर किया है उर्वर, भू का कण-कण सारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा ।

जन-जन का बल है इसमें, जन-जन की है गाथा
हुए निराश जो संघर्षों से ,बनती उनकी आशा
पतित पावन हुआ है इंसा, है देवों को भी तारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा ।

अक्षय धर्म बनकर बहती है, भारत की धरती पर
धन-धान्य बनकर उपजी, युगों से इस परती पर
गाथा पुराण भी गाते, करके महिमामंडन न्यारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा

भारत का इतिहास छुपा है ,इन पावन धारों में
इसकी अमर कहानी लिखी ,सप्तर्षियों के तारों में
कठौती में रैदास की उभरी ,बनकर है युगधारा
युगों- युगों से बहती है ,पावन गंगा की धारा ।

डॉक्टर संदीप कुमार सचेत ,संभल ,उत्तर प्रदेश

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