
अस्त हृदय का सूर्य जब,सँग मन रहे निराश।
बने प्रेरणा वर्तिका,तम का करे विनाश।।
मार्ग न जब सूझे कभी,चहुँदिसि हो अँधकार।
बने दीपिका पंथ में, चलने का आधार।।
ऊर्जा जब कोई नहीं, पग-पग सोच हताश।
बने प्रेरणा वर्तिका,तम का करे विनाश।।
कहाँ नदी खाईं कहाँ,जाए किधर प्रवाह।
सबको अपनी ज्योति से,दिखला दे लौ राह।
आशान्वित करता रहे,जगमग दिव्य प्रकाश।
बने प्रेरणा वर्तिका,तम का करे विनाश।।
कर दे आस्थावान मन,भर दे नव उत्साह।
करने की मन में सदा,करे प्रज्वलित चाह।।
करे राख हर दंभ को,पूरी करे तलाश।
बने प्रेरणा वर्तिका,तम का करे विनाश।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी


