साहित्य

गीता में आत्मा

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

श्रीमद्भगवद् गीता एक विलक्षण ग्रंथ,
स्वयं ईश्वर की दिव्य वाणी है यह।
गीता ज्ञान ही गूढ़ ज्ञान कहलाया।
ज्ञान उपदेश स्थल कुरुक्षेत्र का मैदान।
भगवान कृष्ण ने शांत भाव से,
शिष्य अर्जुन को दिव्य ज्ञान दिया।
यही गीता की है व्यावहारिकता ।

अर्जुन काँप उठे खड़े देख स्वजन संबंधियों को,
युद्धस्थल में अपने विरोध पक्ष में जब,
उनका गांडीव छूट रहा था उनके हाथ से।
भयग्रस्त, पलायनवादी,भ्रमित थे अर्जुन ,
देख सारथी कृष्ण ने अर्जुन की मनोदशा ऐसी,
तब उन्होंने आत्मा के स्वरूप को विस्तार बताया।
ब्रह्म, जीव, जगत, माया,मोक्ष,ज्ञान,
कर्म, भक्ति पर व्यापक व्याख्या कर दी।

गीता में व्यक्त ‘आत्मा ‘के स्वरूप को जाने
सत्य पथ पर चल आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करें।
कृष्ण बोले अर्जुन से दृष्टिगत संसार है नश्वर है।
आत्मा तो है अविनाशी, इसका विनाश नहीं।
आत्मा का न जन्म, न मरण,न उत्पन्न,
आत्मा नित्य, अजन्मा,सनातन और पुरातन है।
आत्मा विकार रहित,अच्छेद, अदाह्य,अक्लेद्य,अशोष्य।

आत्मा को न शस्त्र काटते,न आग जलाये,
न जल गला सके, न वायु इसे सुखाये।
शरीर जन्म के पूर्व अप्रकट ,शरीर मरण के बाद अप्रकट।
बीच की स्थिति में प्राणी शोक क्यों करे।
आत्मा का स्वरूप जान अर्जुन धर्मयुद्ध के लिए तत्पर,
निष्पक्ष भूमिका में कार्यक्षेत्र में कर्म करें।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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