साहित्य

निश्चल प्रेम

जयचन्द प्रजापति 'जय'

(एक सखी दूसरी सखी से कह रही है)

हे सखी
मैं चाहती हूँ

मेरा प्रेम निश्चल हो
कोई आवेश न हो

घृणा से मुक्त हो
मेरे प्रेम में कोई दाग न हो
बिल्कुल साफ वसन की तरह

मैं इस तरह का प्रेम चाहती हूँ
सखी ऐसा प्रेम सदियों तक
लम्बी आयु प्राप्त करता है

मरणोपरांत भी ऐसा प्रेम
सारी दुनिया याद रखती है

मैं सदियों तक
जिंदा रहने वाले प्रेम में
भरोसा करती हूँ सखी।
…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ….. यह कविता ‘निश्चल प्रेम’ में कवि जयचन्द प्रजापति ‘जय’ एक सखी के माध्यम से शुद्ध, निष्कलंक और स्थायी प्रेम की कामना व्यक्त करते हैं।

सखी अपनी साथी से कहती है कि वह ऐसा प्रेम चाहती है जो निश्चल हो, जिसमें कोई आवेश या उत्तेजना न हो, घृणा से पूरी तरह मुक्त रहे और बिल्कुल साफ वस्त्र की तरह निर्दोष हो।

वह विश्वास रखती है कि ऐसा प्रेम सदियों तक जीवित रहता है, मृत्यु के बाद भी सारी दुनिया इसे याद रखती है। कविता प्रेम की शाश्वतता पर जोर देती है, जहाँ शुद्धता ही उसकी लंबी आयु का आधार बनती है।

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