साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम अम्बुज

शाम-ओ-सहर न देख कभी यामिनी न देख।
इक शम्अ को जला ले  घनी तीरगी न देख।

दिलकश नज़ारा ज़िस्त में मिलता नसीब से,
ये  हुस्न   लाजवाब   इसे  सरसरी  न  देख।

ये  लोग  क्या  कहेंगे  उन्हें   कहने  दे जरा,
बढ़ते क़दम को बढ़ने  दे शर्मिन्दगी न देख।

ख़ुशहाल  ही   रहेगी  सदा   जिन्दगी  तेरी,
जो भी ख़ुदा ने दे दिया उसमें कमी न देख।

*अम्बुज* भरा पड़ा है ये ख़ुदग़र्जों से जहाँ,
इंसाफ़  की  लड़ाई  में  तू  दोस्ती  न  देख।

चनरेज राम अम्बुज

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