साहित्य

हास्य की फुहारों और व्यंग्य के तीरों से सजी २३७वीं कल्पकथा साप्ताहिक काव्यगोष्ठी

प्रभु श्री राधा गोपीनाथ जी महाराज की कृपा से संचालित राष्ट्र प्रथम, हिन्दी भाषा, सनातन संस्कृति, सद साहित्य, हेतु कृत संकल्पित कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार द्वारा आयोजित २३७वीं साप्ताहिक ऑनलाइन काव्यगोष्ठी हास्य व्यंग्य के हंसगुल्ले सचमुच हँसी का गुलदस्ता सिद्ध हुई।

संस्था की संवाद प्रभारी ज्योति राघव सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में हर सृजनकार ने अलग रंग बिखेरा और हर पंक्ति ने श्रोताओं को ठहाके लगाने पर विवश कर दिया। कार्यक्रम ने साबित कर दिया कि जब शब्दों की पतंग आसमान छूती है तो आनंद की वर्षा होना तय है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता रीवा मप्र के वरिष्ठ साहित्यकार सी एल दीवाना ने की। नागपुर महाराष्ट्र से जुड़ीं मुख्य अतिथि मेघा अग्रवाल ने अपने विचारों से वातावरण में चार चाँद लगा दिए। मंच संचालन आशुकवि भास्कर सिंह माणिक ने अपनी चुटीली शैली से कार्यक्रम को इस प्रकार साधा कि हर्ष, सजगता, और संदेश का भावपूर्ण संगम बन गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीदी राधा श्री शर्मा द्वारा गुरु वंदना, गणेश वंदना एवं सरस्वती वंदना से हुआ। उनकी मधुर वाणी ने वातावरण को ऐसा पावन बनाया कि मानो आशाओं के दीप भक्ति भाव प्रज्वलित हो उठे। इसके पश्चात् काव्यपाठ का सिलसिला शुरू हुआ और एक से बढ़कर एक रचनाओं ने श्रोताओं को “हँसी के फव्वारे” में भिगो दिया।

बिनोद कुमार पाण्डेय ने व्यंग्य रचना तुम हो गए हो रिटायर से माहौल को गुदगुदाया।

डॉ श्याम बिहारी मिश्र ने काव्य रचनाओं नेता देते धोखा, और महिलाओं में प्रेम के माध्यम में आयोजन को विविधता प्रदान की।

अवधेश प्रसाद मिश्र मधुप ने विवाह संस्कार में फोटोग्राफी के नाम पर टूटती परम्पराओं के प्रति व्यंग्य शैली में आक्रोश प्रदर्शित किया।

विष्णु शंकर मीणा ने व्यंग्य में आधुनिक युग की मानसिकता को जोड़ते हुए कहा मरना हो तो फुर्सत मरना अभी काम ज्यादा है।

पवनेश मिश्र ने सामाजिक जीवन में दोहरे चरित्र पर व्यंग्य करते हुए कहा जय बोलो स्वार्थ विधान की।

आयोजन में, रमेश चंद्रा गौतम, नंदकिशोर बहुखंडी, सुनील कुमार खुराना, आत्म प्रकाश कुमार, ज्योति प्यासी, मेघा अग्रवाल, सी एल दीवाना, भास्कर सिंह माणिक, दीदी राधा श्री शर्मा, की काव्य रचनाओं के साथ ऐसा प्रतीत हुआ मानो हँसी की गंगा बह निकली हो।

कार्यक्रम के अंत में बिनोद कुमार पाण्डेय द्वारा राष्ट्रगीत वन्दे मातरम का गायन किया गया जबकि आमंत्रित अतिथियों सहभागी साहित्यकारों, एवं दर्शकों का आभार प्रकट करते हुए पवनेश मिश्र ने साहित्य की सेवा के संकल्प को दोहराया।

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