
उज्ज्वल था अपना यह जीवन, बेबस आज करूँ प्रभु साधना ।
कौन कहाँ कब है अपना जग, द्वार इसी मिलता बस पावना ।।
मैं कर जोर खड़ी इस चौखट, नैन बहे इनको अब थामना ।
शीश झुका कहती यह नीलम, हाथ छुड़ाकर तू मत भागना ।।
दास खड़ी करती विनती यह, माधव पूर्ण करो अब कामना ।।
कष्ट भले कितने मिलते जग, स्वच्छ रहे मन की हर भावना ।।
श्री चरणों अब पुष्प चढ़ाकर, बोल रही भव से तुम तारना ।
दामन जो पकड़ी प्रभु नीलम, दर्शन दे तब हो दृग सामना ।।
नाथ करूँ विनती इतनी बस, जो दिल टूट गया वह जोड़ना ।
छोड़ दिए सब तो मुझको प्रभु, आस यही बस तू मत छोड़ना ।।
मोड़ लिए सब तो मुझसे मुख, श्याम कभी मुख तू मत मोड़ना ।
प्रेमिल बंधन है तुझसे बस, पावन बंधन तू मत तोड़ना ।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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