
हुआ था जनम मेरा नया
जब तूने मुझे माँ बनाया
जब तू पहली बार मेरी गोद में आई
तब मैंने खुद से एक सवाल किया
क्या इतनी खुशी होती है माँ बनने पर
इतना सुख
इतनी खुशी
आँखो से बहती निश्छल धारा से मैंने पूछा
कहीं ये सपना तो नहीं
तब पास खड़ी मेरी परछाई ने कहा
देख इस नन्हें से फूल को
ये सपना नहीं,
तेरे आँगन का गुलाब है
ये तेरी ममता की किताब है
ये तेरे आँचल की गरिमा है
ये तेरा अभिमान है
किसी ने कहा
अरे ये तो तेरे घोंसले की चिड़िया है
जो एक दिन फुर्र से उड़ जाएगी
तब,
मैंने तुझे अपने आँचल में छिपाया था
तभी मुझे दो और हाथों का स्पर्श महसूस हुआ
कुछ मोती की बूँदे मेरे हाथों पर गिरी
खुशी में डूबी हुई आवाज कानों में आई
अरे वाह! मैं पापा बन गया
ये नन्हीं सी, काँच की गुड़िया सी,
हमारी परी है
हम इसे कभी उड़ने नहीं देंगे
ऽऽऽऽऽऽऽ
लेकिन,
गुलाब तो खिलता ही दूसरों को खुशबू देने के लिए ही है
तू कब खिलकर इतनी जल्दी बड़ी हो गई
पता ही नहीं चला
तब,
तब आज फिर मैंने खुद से एक नया सवाल किया
ये कैसी दुनिया है
परियों को परी लोक में क्यों जाना पड़ता है
खैर,
कभी मैं भी तो परी लोक में ही आई थी
तभी तो
आज मेरी वो नन्हीं सी काँच की गुड़िया,
मेरी नन्हीं सी चिड़िया जब बड़ी हो गई
तब हमने खुद तेरे लिए सोने के पँख
तैयार किए हैं
आज तू अपना घोंसला बसाने जा रही है
एक सुंऽऽदर सा राजकुमार आएगा और तुझे मुझसे कहीं दूर
सपनों की नगरी में ले जाएगा
जहाँ तेरा हर ख्वाब, हर सपना पूरा होगा
तेरे दामन में खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी
खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी
खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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