
भारत माता जकड़ी थी,गुलामी की जंजीरों में।
उनको आजाद कराने की, जिद ठानी थी कुछ वीरों ने ।
सिर पर बाँध कफन अपने,
वो उतर गये मैदानों में।
तीर तोप तलवार का भय,
नहीं था उन दीवानों में।
देश प्रेम पर मर मिटना,
खुद लिखा निज तकदीरों में।
क्रन्दन करुण भी सुना नहीं,
अपने उन बाल गोपालों का।
बस साथ देने निकल पड़े,
आजादी के मतवालों का।
सब जन है देश के आभूषण,
पर उनकी गिनती हीरों में।
जिनकी शहादत करके याद, बहते हैं अश्क रुखसारों पर ।
षाषाण हृदय रख मुस्काती, बच्चों के लिए त्योहारों पर ।
कर दिया व्यथित हृदय सबका,
यूं रुदन छिपाती पीरों ने ।
विनीता चौरासिया
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश



