
सच बोलने की कीमत बढ़ी, खामोशी सस्ती हुई.
हर जुबान बिकाऊ मिली, जमीर की हड्डी टूटी हुई.
दुआओं के बाजार में सौदे लगे ईमान के,
हाथ ऊपर आसमान को, जेब नीचे शर्म से झुकी हुई.
इंसाफ ने तारीखें पहनीं, जुल्म ने तारीफ पाई,
भीड़ ने ताली बजाई जब सच्चाई पिटी हुई.
रिश्तों को यूज किया, फायदे तक याद रखा,
काम निकलते ही मोहब्बत फाइल में बंद पड़ी हुई.
भूख को सब्र सिखाया, अमीरी को भाषण मिला,
न्याय की थाली सजी रही पर रोटी आधी कटी हुई.
फिर भी इक जिद है दिल में, अभी सब खत्म नहीं,
राख में सच की चिंगारी आज भी जिंदा जली हुई.
जो सच के सौदों से इंकार करे, न झुके न बिके,
वही लिखेगा कल का दौर, सच की कलम से तख्त हिले.
महेजबीन मेहमूद राजानी
सड़क अर्जुनी/ महाराष्ट्र
9423415191




