
सूरज की किरणों में सने सने वो गर्मी है,
दस्तक ग्रीष्म ऋतु की सर्दी में कुछ कमी है।
भंवरों का गुंजन कानों में रस घोलता,
इसलिए प्रकृति स्वर सुन मन डोलता ।
पुरवा हवा के झोंके साथ मन के डोलते।
तितलियों के पंख रंगों से होली खेलते।
धरा का कण कण देखो फूलांकित हो गया।
आया ऋतुराज बसंत मन सबका खुश हो गया।
मंजरी की खुशबू से महका सारा उपवन,
नदी की लहरों मैं जैसे जागा है नया जीवन।
पतझड़ का अंत हुआ नव सृजन की बारी है,
हर और बसंत की अनुपम छवि न्यारी है।
गांव की पगडंडिया खेत अब महकने लगे,
पक्षी छहचहा कर खुशियां बिखरने लगे।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



