साहित्य

काशी: जो मेरे जेहन में बसती है

रविशंकर शुक्ल

कभी कैलाश, कभी वह काशी
रमते रहते, घट घट के वासी
थकते नहीं गुणगान से जिनके
औघड़, साधु,संत, संन्यासी
शिव जहाँ पर रहते हैं
वहीँ पर गंगा बहती हैं
वही मोक्षदायिनी काशी
मेरे अंतर्मन में रहती है,
वरूणा अस्सी का संगम,
रामचरितमानस का उद्गम;
तुलसी, कबीर, रैदास वहाँ,
और जयशंकर प्रसाद वहाँ;
वहाँ थे भारतेंदु हरिश्चन्द्र
और थे वहाँ मुंशी प्रेमचंद
गंगा का कल-कल निनाद
मिटा देता है हर्ष-विषाद
वहाँ के वासी संकट मोचक
अपने हर भक्तों के रक्षक
तीन लोक से न्यारी काशी
महिमा गायें, प्रवासी, वासी
उसके घाटों की छटा निराली
वह प्राचीन व गौरवशाली
उसकी गाथा बहुत निराली
वह हो रही है वैभवशाली
क्या क्या लिखूं,भरूँ शब्दों को
बहुत रहेगा,फिर भी खाली
शिव जहाँ पर रहते हैं
वहीं पर गंगा बहती हैं
वही मनोरम छवि प्रत्येक पल
मेरे हृदय में बसती है ।
एक लंबा लगभग डेढ़ दशक का समय हो चुका है मुझे काशी दर्शन किये फिर भी यहाँ की संस्कृति, संस्कार, आबोहवा आज भी मेरे जेहन में ताजा है।कहाँ से शुरू करूँ आध्यात्मिक नगरी की याद आते ही,मुझे बचपन याद आ जाता है, माँ की कही हुई बातें याद आती हैं, माँ की आपबीती सुनने के अनुसार, माँ वर्षों तक अस्सी पर रहीं थीं और वहीं पर मेरे बड़े भाई लोग और बड़ी बहनें पले, बढ़े और अध्ययनरत रहे। माँ के अतीत की बहुत सारी यादें अस्सी के उस मकान और बनारस से जुड़ी थीं। एक लम्बी अवधि तक मेरे संयुक्त परिवार के शिक्षा का केन्द्र बनारस ही रहा और कालांतर में कलकत्ता की तरफ अग्रसर हो गया। सात-आठ दशक पूर्व और इसके भी पूर्व पूर्वांचल और अन्य समीपवर्ती क्षेत्र की आम जनता के लिए, बनारस वही हैसियत रखता था जो आज के जमाने में मुम्बई या दिल्ली का है। गरीब, पीड़ित और शोषित जनता के लिए,जीवन -यापन को बेहतर परिवर्तन देने हेतु उसका पहला कदम बनारस ही होता था। बनारस, भारत का पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर है तो साथ ही साथ पूर्वांचल की सांस्कृतिक राजधानी भी है। मेरी बनारस की पहली यात्रा (देश-दुनियां को समझने लायक होने के पश्चात) नौ-दस साल की उम्र में हुई। मैं, अपने पिता जी एवं उनके एक मित्र के साथ (जो गाँव में ‘नेता जी ‘ के उपनाम से मशहूर थे।मार्कंडेय जी दर्शन करने के पश्चात वहां पहुंचा था। मैं आठ-दस दिनों से कुछ खा,पी नहीं रहा था,अतएव पिता जी मुझे लेकर सर्वप्रथम मार्कंडेय जी गये, वहां एक कुटिया में एक साधु (सिद्ध पुरुष) के दर्शन करने पर और समस्या बताने पर उन्होंने पेड़ा का प्रसाद दिया और कहा कि बालक आज और कल दिन में भी कुछ नहीं खायेगा पर कल शाम से निश्चित ही खाना खायेगा। सब कुछ वैसा ही घटित हुआ और तत्पश्चात वहां से हम लोग बनारस गये। बनारस में मेरे पिता जी एक मौनी बाबा से मिले, वह स्लेट पर लिखवा कर प्रश्न पढ़ते थे और फिर उसका स्लेट पर ही उत्तर देते थे। अब क्या प्रश्न थे क्या उत्तर थे वह सब कुछ तो मुझे याद नहीं है पर उसके बाद अगले दिन पिता जी मुझे फकीरी इलाज के बाद मेडिकल इलाज के लिए एक डाक्टर को दिखाने ले गए। डाक्टर साहब ने भूख लगने के लिए कोई टॉनिक लिख कर दे दिया। फिर हम लोग विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए गए।पानी में दिये की लौ के साथ चलने वाली नाव (खिलौना) मैंने पहली बार बनारस में ही देखी। खरीदने की भी लालसा थी मन में पर पूर्ण बाल हठ, शायद पिता जी से नहीं कर सका था। बचपन व किशोरावस्था बीती,युवावस्था आई और गार्हस्थ्य जीवन मे आने के बाद वह नाव मैंने अपने बेटे के लिए खरीदी थी। बनारस की मेरी दूसरी यात्रा सन् 65 में मेरे बड़े भाई केशवचन्द्र शुक्ल के साथ हुई। मेरी उम्र उस समय ग्यारह -बारह साल रही होगी। भाई साहब के साथ भाभी जी भी थीं जो विदेशी ( डच )महिला हैं। हम लोग बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर, भारत माता मंदिर, विश्वनाथ मंदिर (वी.एच.यू.),दुर्गा मंदिर, संकट मोचन, सारनाथ आदि सभी जगह गये, घूमे, दर्शन किये, गंगा के किनारे नौका विहार किये एवं सभी घाट के दर्शन हुए। काशी विश्वनाथ मंदिर में भाई साहब को भाभी के दर्शन
करने हेतु अनुमति के लिए पंडे – पुजारियों से काफी मशक्कत करनी पड़ी,पुजारी लोग तो भाभी के विदेशी होने के कारण मना कर रहे थे, बहुत देर तक वाद- विवाद के पश्चात दर्शन की अनुमति दिये। बनारस का एक दिलचस्प वाकिया है। हम तीनों लोग होटल वाराणसी मे ठहरे थे, भैया, भाभी को कहीं जाना था, मुझसे भी वह लोग पूछे चलने के लिए, मैने अनिच्छा प्रकट की और उन लोगों के जाने के पश्चात मैं सो गया। जगने पर, जबकि शाम हो रही थी, आधे घंटे तक मुझे यही महसूस होता रहा कि सुबह हुई है, बाद में फ़्रेश होकर बेयरा को बोलकर चाय मंगाया और अपनी बेवकूफ़ी पर खिसियाता रहा। बनारस की तीसरी यात्रा सन् 72-73 के बीच हुई। उस समय मेरे बहनोई काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएच.डी कर रहे थे और दीदी भी उनके साथ बनारस में ही थीं। फिर तो चौथी और पाँचवी यात्रा भी बनारस की कुछ समयान्तराल पर पूरी हुई। जिसमें से कुछ खास घटनाएं उल्लेखनीय हैं। एक बार तो,ट्रेन से मैं सुबह के पहले लगभग तीन बजे बनारस पहुँच गया। बनारस कैंट से रात मे ही रिक्शे वाले को ‘लंका’ चलने के लिए बोला ,पर जब डेढ़ किलोमीटर तक सुनसान रास्ते पर जिसके बगल में गहरी खाई थी, लगातार रिक्शे पर चलता रहा तो अपनी गलती का अहसास हुआ कि इस तरह रात मे नहीं चलना चाहिए था। बहरहाल रिक्शा वाला ईमानदार था (जैसा कि आम गरीब लोग होते हैं) और मैं भी किसी आसन्न संकट के लिए सतर्क, पर ऐसी किसी परिस्थिति ने संकटकालीन दस्तक नहीं दिया। बी.एच .यू. में जीजा जी के टीचर्स हास्टल स्थित फ़्लैट में सकुशल पहुँच गया। जीजा जी, बाद में नगवा स्थित एक भवन ‘में रहने लगे थे। इस बीच मेरे भांजे का जन्म हो चुका था, प्यार से लोग उसे मुन्ना पुकारते थे। चार-पांच महीने के इस बालक के सौम्य चेहरे को देखने हेतु, रास्ते के लोग भी ठिठक कर रुक जाते थे। बाल आकर्षण वैसे भी सम्मोहक होता है। इन तीन यात्राओं के बीच एक बार बी.एच.यू. के पास से गंगा के किनारे-किनारे टहलते हुए अस्सी तक गया। उस समय नदियाँ इतनी प्रदूषित भी नहीं हुई थीं, और टहलने का आनंद मनोरम जान्ह्वी के किनारे सर्वथा नव्य अनुभव था। एक बार नगवा से गोदौलिया तक पैदल चल कर, वहां के चौराहे पर प्रसिद्ध ठेले वाले की चाय पी, जिसके यहाँ चालीस -पचास लोगों की लाइन सिर्फ चाय पीने के लिए लग जाती थी और लोग स्थिर, शांतचित्त होकर अपनी बारी आने का इंतजार करते थे।बनारस में ही अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्म ‘जंजीर ‘ मैने देखी,दीदी और जीजा जी के साथ। एक बार मैं और मेरा छोटा भाई जीजा जी से पूछ बैठे कि आप फिल्म कब देखते हैं, देखते भी हैं कि नहीं तो उन्होंने प्रत्युत्तर दिया कि देखो, वैसे तो मुझे कहीं की यात्रा के लिए जब ट्रेन पकड़नी होती है और ट्रेन के आने मे जब ढाई से तीन घंटे का विलम्ब होता है तो रेलवे स्टेशन के पास वाली टाकीज में जो भी फिल्म लगी हो,समय व्यतीत करने के लिए मैं देख लेता हूँ। इन्हीं यात्राओं के क्रम में एक दो घटनाएं और दिलचस्प हैं।विंध्यवासिनी देवी, मिर्जापुर के दर्शन हेतु बस-यात्रा में, वाराणसी से ही एक सहयात्री मिले निहायत शरीफ़ और भले आदमी।रास्ते में उनके सौजन्य से यात्रा और भी सुखद रही। बाद मे, उनका परिचय पूछा तो वे बोले कि उनका नाम उमा शंकर सिंह है और वह गाजीपुर के किसी डिग्री कालेज में प्रिंसिपल हैं। दूसरी घटना वी.एच.यू.के सर सुन्दरलाल अस्पताल की है। किसी मेडिकल परामर्श हेतु मैं और जीजा जी वहां गये, वी.एन.पी.त्रिपाठी, डा.साहब के नेम प्लेट पर यही नाम लिखा था, पर उसके नीचे मैंने पढ़ने का प्रयास किया तो एम.बी.बी.एस. के बाद से दो या ढाई लाइन में तो उनकी डिग्री लिखी हुई थी। डाक्टर साहब जितने शिक्षित और बड़े चिकित्सक थे उसी अनुपात में परम विनम्र भी थे। इन्हीं यात्राओं के क्रम में किसी मित्र से मिलने मड़ुवाडीह जाते समय जब भी लहरतारा तालाब के पास से गुज़रा तो कबीर को याद किया, हठात् ज़ेहन में कौंधता था उनका बचपन फिर चल-चित्र की तरह पूरी जिंदगी,जो मगहर जाकर सदैव के लिए अमर हो गयी ।
बनारस की पुनः यात्रा सन् 1977 में सपत्नीक किया। इस बार हम लोगों के ठहरने का स्थान बी.एच.यू .के आस -पास से बदल कर स॔स्कृत विश्वविद्यालय हो गया था।यहाँ हम लोग मिश्र जी के यहाँ ठहरे, जो विश्वविद्यालय में एकाउंटेंट के पद पर कार्य रत थे। सुखद संयोग से मेरे ममेरे भाई रामनगीना पांडेय वहां उपस्थित थे जो मिश्र जी के घनिष्ठ मित्र थे। वैसे इस सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से मेरा भी कुछ रिश्ता-नाता है, इसका पुराना नाम क्वींस कालेज था और मेरे पिता जी ने इसी कालेज से हाईस्कूल सन् 1923 में प्रथम श्रेणी में, कालेज में सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण किया था। सन् 1977 में सपत्नीक पुनः सभी दर्शनीय स्थलों पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसमें नवीनतम रूप से तुलसी मानस मंदिर जुड़ गया था। सारनाथ जो वौध्द समुदाय का एक विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण पवित्र स्थल है, यही पर बारह साल की घनघोर तपस्या के पश्चात सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध बने थे। यह भारत के प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थानों में से एक है। विश्वनाथ मंदिर (बी. एच.यू.)और तुलसी मानस मंदिर संगमरमर की शिलाओं पर निर्मित वास्तु कला की अद्भुत
मिसाल है। यहां विश्वनाथ मंदिर में गीता एवं मानस मंदिर में राम-चरित-मानस दीवारों पर अंकित है। नवरात्रि व दशहरा के आस-पास वाराणसी मे राम लीला का भव्य आयोजन होता है। विभिन्न स्थलो पर राम लीला का क्रमवार मंचन लंबी अवधि तक चलता ही रहता है। इस शहर मे व्यक्ति को अपने पास लाने के लिए एक तरह का खिंचाव है, सम्मोहन एवं चुम्बकीय आकर्षण है। पुराने शहर में खास कर विश्वनाथ मंदिर के पास गलियों का जमावड़ा है। नया शहर फिर भी साफ सुथरा विरल है, हमारे पुराने ग्रंथों, पुराणों एवं महाभारत आदि में इस नगर की विभिन्न प्रसंगों मे विशद चर्चा और महात्म्य है।
इसी शहर मे जगद्गुरु शंकराचार्य का मंडन मिश्र और उनकी पत्नी से ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था। यह पूरा का पूरा शहर ही ब्राह्म मुहूर्त में जाग उठता है, घंटे, घड़ियाल और शंखों की ध्वनि सुनाई देने लगती है। बनारस की सुबह मेंअनोखी ताजगी, शीतलता एवं पवित्रता है। तब बनारस में सुबह का नाश्ता दूध के बगैर नहीं होता था और दूध को फेंटने का ढंग भी अपनी अलग ही खासियत लिए हुए था। पान तो बनारस का प्रसिद्ध है ही और यह बनारसी पान यहाँ ही नहीं बल्कि विश्वविख्यात है। फिल्में भी बनारस पर कई एक बन चुकी हैं और आये दिन नई फिल्मो की शूटिंग भी चलती ही रहती है। गंगा किनारे अर्द्धचंद्राकार घाटों की छटा निराली है। पौराणिक आख्यान है कि भगवान शंकर के त्रिशूल पर यह नगरी बसी हुई है, इस नगर का एक विशिष्ट पौराणिक व आध्यात्मिक महात्म्य है। लोग बाग मोक्ष प्राप्ति हेतु काशी में बसना चाहते हैं।तुलसीदास के राम चरित मानस की आलोचना और ख्याति भी इसी शहर में हुई। कबीर को याद करते हुए उनके गुरु रामानंद को याद करना स्वाभाविक है। यही पर संत रैदास ने पदों की रचना की जिनसे मिलने वृंदावन में मीरा पहुँची थीं। बनारस संतों, साधुओं,ज्ञानियों, औघड़ों,अवधूतों एवं साहित्यकारों का
शहर है। कबीर ने यहीं से निर्गुण का उपदेश दिया, तुलसी ने सृजन-साधना किया। भारतेन्दु ने यहीं पर हिन्दी की अलख जगायी थी। यहीं जयशंकर प्रसाद ने कालजयी रचनायें की। मुंशी प्रेमचंद ने यहीं से हंस पत्रिका का संपादन किया और अपने विपुल साहित्य से हिन्दी व उर्दू को गौरवान्वित किया। अन्य कई महान साहित्यकारों ने कभी न कभी एक लम्बा समय बनारस में बिताया जैसा कि मुक्तिबोध,त्रिलोचन विशेषतः उल्लेखनीय हैं। विद्यानिवास मिश्र ने बनारस से जुड़े रह कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की चर्चा के बिना तो यह साहित्य परक चर्चा ही अधूरी है ,इनकी अनेक रचनाएँ हिन्दी साहित्य मे मील का पत्थर हैं ।नव रचना कर्म में भी बहुत सारे उल्लेखनीय नाम हैं जो अपने-अपनेप्रकार से हिन्दी साहित्य हेतु महत्वपूर्ण योगदान मे तल्लीन हैं। इनके अलावा मेरी पीढ़ी के जिन रचनाकारों से मैं निरन्तर प्रभावित रहा उनमें शिवप्रसाद सिंह, शम्भुनाथ सिंह, डॉ विश्वनाथ प्रसाद, भैया जी बनारसी, चोंच जी,ज्ञानेन्द्रपति, काशीनाथ सिंह आदि का उल्लेख समीचीन है। अन्य बहुत से साहित्यिक व्यक्तित्व भी बनारस से ही जुड़े हुए हैं। यहीं पर बिस्मिल्ला खां ने संगीत के सुरों को जोड़ा। यहीं पं. मदन मोहन मालवीय
ने विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय बनवाया। यहीं करपात्री जी
अध्यात्म पर चर्चा किया करते थे। इस शहर की खासियत है बनारसी पान और पान तो आज भी अपनी गुणवत्ता के
साथ मशहूर है। मेरे अनुसार पानी में चलने वाली नाँव (खिलौना) भी नहीं बदला, वह भी दिये की लौ के साथ चलते हुए बचपन की तरफ खींचता है। बदला है तो सिर्फ बदला है गंगा का पानी, जिस गंगा को हम माँ कहते हैं, हम धरती को भी माँ कहते हैं, और माँ मनुष्य के वर्गीकरण में एक औरत है, यानि कि औरत के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण, गंगा के पानी की तरह ही मैला हुआ है। औरत, पुरूष की अपेक्षा कहीं अधिक संवेदनशील, बेसहारा, गरीब और वंचित लोगों के लिए होती है। इन गरीब, वंचित और बेसहारा लोगों के प्रति भी हमारी संवेदना पहले से अत्यधिक कमजोर हुई है। आज आवश्यकता है गरीब, बेसहारा और वंचितों को संभालने की, औरत को सम्मान देने की, एवं गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की। सद्गुणों के साथ-साथ इस शहर में गुंडई भी अपने खास अंदाज में है। वह भी बदस्तूर जारी है अपनी अंदाजे बयां के साथ। मई 2007 में, मैं निजी वाहन से संकट मोचन दर्शन
हेतु गया। संकट मोचन दर्शन के पश्चात पुराने विश्वनाथ मंदिर में दर्शन किया, जहां पर गुंडई का कार्य भार पुलिस दल ने सुचारु रूप से संभाल लिया था। शायद इनकी सोच यह हो कि,यदि यह गुंडई का कार्य करने लगेंगे तो हो सकता है गुंडई करने वाले लोग कोई अन्य उत्तम कार्य करने लगेंगे। एक सुखद परिवर्तन दिखा कि इस बार विदेशी लोग निर्बाध दर्शन कर रहे थे।अभी हाल के दिनों में सन् 2007 के बाद चाह कर भी बनारस की यात्रा नहीं हो पायी थी पर यूँ कहें कि सुखद संयोग बन ही गया। साहित्य सृजन में महत्वपूर्ण उपस्थिति के कारण दो व्यक्तियों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है और जिनसे सोशल मीडिया के माध्यम से मेरा लगातार सम्पर्क बना हुआ है , वह हैं डॉ.सीमांत प्रियदर्शी और राजीव श्रीवास्तव।
बनारस के घाटों पर अस्सी से दशाश्वमेध घाट तक विहंगम दृश्य मंत्रमुग्ध करता है। जान्ह्वी के किनारे खड़े होकर, लहरों को अपलक निहारते हुए इस शहर का इतिहास जीवंत हो उठता है। यहां के अलग-अलग घाटों पर खड़े होकर अलग-अलग प्रकार की अनुभूति मन में होती है। मेरी माँ का नाम ‘शिवकाशी ‘था, काशी में शिव तो हैं ही और काशी पूरे जोर शोर से बम-बम बोल रहा है।
डेढ़ दशक बाद अचानक ही न्यूनतम समय के लिए काशी दर्शन का कार्यक्रम बन गया था। यह हाल ही में सत्रह और अठारह सितम्बर की बात है।
सुबह-सुबह सपत्नीक वाराणसी के लिए प्रस्थान किया और लगभग साढ़े दस बजे पहुँच गए। सर्वप्रथम शहर कोतवाल काल भैरव का दर्शन। भीड़ ज्यादा होने से वहां से निकलते हुये दुर्गा कुंड में माँ दुर्गा का दर्शन तत्पश्चात तुलसी मानस मंदिर और त्रिदेव मंदिर के कपाट बन्द होने से संकट मोचन की तरफ,पर वहां भी वही स्थिति पर ढाई बजे के बाद दर्शन के लिए खुलने की संभावना थी।
अतः यह निर्णीत हुआ कि सीधे अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित बाबा विश्वनाथ का दर्शन कर लिया जाए। वहां दर्शन की अभिलाषा बेहतरीन ढंग से परिपूर्ण,बस यह लगा कि मंदिर के स्वच्छता अभियान में थोड़ी सी कमी है। तत्पश्चात वही पर दोपहर का भोजन ड्राइवर और सपत्नीक किया। उसके बाद हम लोग संकट मोचन दर्शन करने के लिए निकल पड़े। संकट मोचन दर्शन के बाद अब यह सोचा गया कि गोदौलिया चला जाये सायं काल की गंगा आरती देख लिया जाए। पर वहां जाने पर पता चला कि गंगा आरती मौसम की वजह से लगभग बीस दिनों से बंद है अतएव बाबा विश्वनाथ का दर्शन कर ने के लिए विश्वनाथ कॉरिडोर पहुँचे और कतार में लग गए।
यहाँ यह ध्यातव्य है कि जब से वाराणसी हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र हुआ है बनारस की धज में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है। आरंभ में ही महानगर में प्रवेश करते समय बनारस को पहचानना पड़ता है। घाटों से लेकर महानगर के अंदर भी एक नया रंग रूप और सज धज दिखाई पड़ता है।
बहरहाल तीन-चार घंटे की कतार वाले प्रक्रिया के बाद बाबा भोलेनाथ के दर्शन हो गए। तत्पश्चात वहीँ दशाश्वमेध परिक्षेत्र में ही एक होटल में हम सभी ने रात्रि विश्राम किया। रात्रि में ही वहाँ के एक वरिष्ठ साहित्यकार मधुकर मिश्र जी से सुबह दस बजे मिलने का कार्यक्रम बन गया था। पर सुबह नाश्ते के बाद,पार्किंग से कार निकालते समय गाजीपुर से डा.सीमांत प्रियदर्शी का फोन आ गया कि आप लोग यहाँ से निकलते निकलते रामनगर किला और चाको घाट एवं नमो घाट भी देख लीजिए। तदनुसार रामनगर पहुँच गए पर किला देखने के पहले ही पत्नी की कुछ तबियत खराब होने के कारण उस कार्यक्रम को छोड़ना पड़ा और हम लोग मधुकर मिश्र जी से मिलने मड़ुवाडीह की तरफ चल दिए।
उसी रूट पर आगे हमें माँ विंध्यवासिनी देवी के दर्शन हेतु जाना था।
इसबीच में एक दिली इच्छा समयाभाव में नहीं पूरी हुई,वह सोच विचार के यशस्वी प्रधान संपादक जितेन्द्रनाथ मिश्र जी से मिलने की जो अब अगली यात्रा में ही संभव है।
आगे मधुकर मिश्र जी से मुलाकात और विभिन्न साहित्यिक परिचर्चा के पश्चात हम लोग विंध्याचल की तरफ प्रस्थान कर गए। विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन के पश्चात वही पास मे एक अन्य देवी स्थान पर दर्शन किये। इसके बाद अष्टभुजा देवी का दर्शन जहाँ लगभग साढ़े तीन सौ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहुँचना था। यद्यपि वहां रोप वे भी बन गया है और पहाड़ पर से घाटी का दृश्य अत्यंत मनमोहक दिखाई पड़ रहा था।
तत्पश्चात इलाहाबाद होते हुए अगले तीन घंटों में वापस अठारह सितम्बर को रायबरेली पहुँच गए।
रविशंकर शुक्ल
कृष्णायन,एम-2/67,
जवाहर विहार कालोनी,
रायबरेली-229010
मो.फोन नंबर
8707020053,
9450626706

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