
बचपन से लाल गुलाब मन भाये
सहेली बगिया से जब तोड़ लाये
देख उन्हें मन अति हर्षाये
मन करता वह रोज लाये
पर क्या करू कि यें न मुरझाये
पंखुड़ियां सदा ही खिलखिलाए
क्यों न इनको किताबों में रखा जाय
ये सुझाव अन्य सहेलियों से आये
किताबों मे रख अत्यंत प्रसन्न
पा लिया हो जैसे सैकड़ों धन
खिलखिलाती खूब फुदकती
घर आ सबकों खूब दिखाती
मेरे लिए क्या थे वें गुलाब
लिखी न जा सके इस पर किताब
छुए हुए थे मन के उस कोने को
खोला जिसे आज पंक्तियाँ रचने को
मीनाक्षी शर्मा मनुश्री




