साहित्य

लघुकथा- उधार

डॉ ऋतु अग्रवाल

“पापा! आपके बस का कुछ नहीं है। आप हमारी ज़रूरतें जब पूरी नहीं कर सकते थे तो हमें पैदा ही क्यों किया!” बड़े बेटे नितिन ने ताना मारा।
“देख लो! अब तो बच्चे भी कहने लगे। मेरा तो पूरा जीवन इसी तंगहाली में बीत गया। तुम्हारे साथ न तो कुछ अच्छा खाने को मिला न ही अच्छा पहनने को। जेवर-गहने, घूमना-फिरना तो भूल ही जाओ।” पत्नी पूजा कहाँ पीछे रहने वाली थी।
“पापा! एक नई गाड़ी के लिए ही तो कह रहे हैं हम। देखिए! चाचा जी भी तो नई गाड़ी लाए हैं। आप चाहते हैं कि उनकी नई गाड़ी के सामने हम पुरानी गाड़ी चला कर नीचा देखें।” बेटी अनु बोली।
“बेटा! तुम्हारे चाचाजी का परिवार छोटा है। उनके खर्चे कम है, वह खरीद सकते हैं हम नहीं।” दिवाकर ने समझाने का प्रयास किया।
“पापा! आजकल तो ईएमआई का ज़माना है, चुका देंगे धीरे-धीरे।” नितिन ने सुझाव दिया।
“ईएमआई नहीं, इसे उधार कहते हैं। सामने वाले रस्तोगी जी की बेइज्जती भूल गए हो शायद‌ जब ईएमआई न भर पाने के कारण उन्हें बेइज्जत करते हुए फाइनेंस कंपनी ने उनकी गाड़ी उठा ली थी।” दिवाकर ने तैश में आकर कहा।
“ओह, हाँ! कैसे रस्तोगी जी सिर झुकाकर बैठे थे। उनका चेहरा भी कितना मलिन हो गया था।” पूजा ने कहा तो बच्चे भी हामी में सर हिला रहे थे।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!