
अगर प्रेम मिलन करना ही था,
तो इतना बवाल मचाया ही क्यों।
अगर प्यार नहीं था तुम्हें मुझसे,
तो इतना समय गंवाया ही क्यों॥
नज़रों से नज़रें मिलाकर तुमने,
दिल का दिया जलाया ही क्यों।
जब साथ निभाना था ही नहीं,
तो सपना नया सजाया ही क्यों॥
वादों की सेज बिछाकर फिर,
मन को इतना बहलाया ही क्यों।
जब राह बदलनी थी तुमको,
तो साथ कदम बढ़ाया ही क्यों॥
भीड़ भरे इस जग में आकर,
मुझको अपना बताया ही क्यों।
जब छूट ही जाना था तुमको,
तो मुझको गले लगाया ही क्यों॥
अब यादों की चादर ओढ़े,
मन ने खुद को समझाया ही क्यों।
जो दर्द ही देना था तुमको,
तो प्रेम-गीत सुनाया ही क्यों॥
‘दिव्य’ ने दिल की पीड़ा लिख दी,
तुमने इसे रुलाया ही क्यों।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




