साहित्य

माँ की पाती: बिटिया के नाम

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

“अभी तो आई थी तू, अभी जाने की तैयारी है,
ये कैसी रीत है दुनिया की, जो सब पर भारी है।

मैं पूछती हूँ बार-बार—’सामान सब रख लिया न?’
पर असल में पूछना चाहती हूँ—’क्या मेरा अंश यहीं रख दिया न?'”

“वो आचार का डिब्बा, वो गुलाबी साड़ी की तह,
इनमें बांध कर दे रही हूँ, अपनी ममता की सतह।

जब भी मन उदास हो, इन्हें खोल कर देख लेना,
मेरी दुआओं का साया, अपने संग लपेट लेना।”

“नजरें नहीं मिलाईं तुझसे, कि कहीं बांध टूट न जाए,
हँस के विदा करूँ तुझे, ये हौसला छूट न जाए।

कहती हूँ ‘पागल मत बन’, पर दिल मेरा भी रोता है,
बेटी का विदा होना, जैसे खुद से बिछड़ना होता है।”

“ससुराल में खुश रहना, वहां खुशियाँ अपार मिले,
जैसा मायके में मिला, वैसा ही वहाँ दुलार मिले।

पर याद रखना बिटिया, ये देहरी तेरी अपनी है,
द्वार खुले रहेंगे हमेशा, तू इस घर की जननी है।”

“जा… खुश हो के विदा हो, मेरी लाड़ली, मेरी रानी,
लिखना अपने नए घर में, सुख की नई कहानी।”

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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