साहित्य

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ

सुमन बिष्ट

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ आपस में प्रेम व सदभाव हो,
जहाँ बातों में कटुता न हो,
जहाँ मुस्कान के पीछे छुपी,
कोई दग़ाबाज़ी व पटुता न हो।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ चेहरे के ऊपर चेहरा लगा,
कोई मजबूरी में यहाँ न जिये,
जहाँ इंसान, इंसान ही बना रहे,
और हर सच सबसे खुलकर कहे।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ दिल किसी दहशत से नहीं,
जिंदगी के होने से धड़के,
जहाँ भाग्य में ख़ुशियाँ लिखी हों,
वहाँ हर दिल फूलों सा महके।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ दिल किसी के लिए नहीं,
बस जीने के लिए धड़के,
जहाँ कोई अपना होकर भी,
दिल को न तोड़े,न परखे।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ मोहब्बत यक़ीन से हो,
और वादों की बैसाखी न हो,
जहाँ प्रेम हर हालत में निभाये,
बस शब्दों की कारीगरी न हो।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ रिश्तों में मतलबीपन,
ज़हर बनकर न घुले,
जहाँ अपनापन इतना सच्चा हो,
कि परायापन कभी न लगे।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ रिश्ते स्नेह के धागों के,
एहसास से चुपचाप बँधे हों,
जहाँ दोस्ती में मतलब नहीं,
बस प्रेम के वचन गुँथे हों।

मैं इक ऐसी दुनिया चाहती हूँ-
जहाँ बुरे वक़्त में साथ देना,
सबसे बड़ा संस्कार हो,
मैं ऐसा जहाँ चाहती हूँ
जहाँ इंसानियत ही व्यवहार हो।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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