
नींद भले ही, लेलो मेरी
नहीं शिकायत, कभी करूंगा
लेकिन मुझको बने सहारा
उन सपनों को, कभी न दूंगा
सपनों से जिन्दा हूं, अब तक
ये ही तो मेरी सौगातें
जब जब रहता, में अकेला
सपनों से करता हूं बातें
लो ख्याल आवारा मेरे
नहीं शिकायत,कभी करूंगा
पर जो देते, मुझे नजारा
उन नयनों को, कभी न दूंगा
लेलो परंपराएं, रूढ़ियां
नहीं हिफाज़त, कभी करूंगा
पर जो नवयुग लाये जग में
उन किरणों को, कभी न दूंगा
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




