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एस.आर.आर. राजकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का भव्य आयोजन

करीमनगर: स्थानीय एस.आर.आर. राजकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस अत्यंत उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। तेलंगाना साहित्य अकादमी के सौजन्य से, कॉलेज के तेलुगु विभाग और ‘साहिती सोपति’ संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह कार्यक्रम छात्रों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणादायी रहा।

कविता मानवता और आत्मीयता का सेतु: प्राचार्य
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. कलुवकुंटा रामकृष्ण ने कहा कि कविता के माध्यम से मानवीय संबंध प्रगाढ़ होते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि कविता न केवल मानवता को पल्लवित करती है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय भ्रातृत्व का मार्ग भी प्रशस्त करती है। मातृभाषा को हमारी अस्मिता का प्रतीक बताते हुए उन्होंने इसके संरक्षण को अपनी संस्कृति की रक्षा के समान बताया।

मातृभाषा से ही संस्कृति की सुरक्षा: विशिष्ट अतिथि
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित ‘साहिती गौतमी’ के सचिव कोत्ता अनिल ने कहा कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हमें अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहिए। उन्होंने कहा कि तेलंगाना राज्य के गठन में यहाँ की भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और उच्च पदों पर आसीन होने के बावजूद हमें अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।

इतिहास और महत्व पर प्रकाश: मुख्य अतिथि
मुख्य अतिथि एवं ‘उदय साहिती’ संस्था के मानद अध्यक्ष दास्यम सेनाधिपति ने 1952 के ढाका भाषा आंदोलन के शहीदों को याद किया। उन्होंने बताया कि यूनेस्को (UNESCO) ने 1999 में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता दी थी। उन्होंने कहा कि मातृभाषा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है और जो अपनी भाषा में निपुण होता है, वह अन्य भाषाओं को भी सहजता से सीख सकता है।

सांस्कृतिक प्रस्तुति और कवि सम्मेलन
सम्मेलन के समन्वयक बुर्ला वेंकटेश्वर ने कविता को एक सामाजिक जिम्मेदारी बताया। इस अवसर पर शिक्षकों और छात्रों द्वारा एक भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया:

रसायन विज्ञान के प्राध्यापक मेजर रेल्ला संजीव ने अपनी रचना “तीय तीयनी पलवरिंत” (मधुर प्रलाप) से सम्मेलन का आगाज़ किया।

अंग्रेजी विभाग के सहायक आचार्य कट्टा वेणु ने अपने शतक “यादिकुंचुकोरा याष्टपडक” से पद्य सुनाया।

तेलुगु सहायक आचार्य डॉ. रापर्ति श्रीनिवास ने “मरुवकूडेपुडू मातृभाषा” (मातृभाषा को कभी न भूलें) कविता के माध्यम से भाषा की महत्ता बताई।

हिंदी सहायक आचार्य कोमुरारेड्डी ने “गम्यंलेनी गमनमा” (बिना लक्ष्य के सफर) शीर्षक से गद्य कविता प्रस्तुत की।

छात्र सुमन, नरेश, वासवी, रम्या, रंगस्वामी और डॉ. चैतन्य जैसे अन्य रचनाकारों ने भी अपनी प्रभावी कविताओं से सबका मन मोह लिया।

विशेष सम्मान
कार्यक्रम का एक भावनात्मक क्षण तब रहा जब महाविद्यालय के पूर्व छात्रों—चिंता श्रीनिवास और विक्रम ने अपने प्रिय शिक्षक और वर्तमान प्राचार्य प्रो. कलुवकुंटा रामकृष्ण का गजमाला पहनाकर भव्य सम्मान किया।

कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागी छात्रों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। इस अवसर पर तेलुगु, इतिहास और अन्य विभागों के अनेक प्राध्यापक व गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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