साहित्य

मानस मन्थन

डॉ.उदयराज मिश्र

किया न जिसने आजतक,मानस का रसपान।
भले चतुर बनता फिरे,मूढ़ मंदमति जान।।
मूढ़ मंदमति जान,कटे सारे भव बंधन।
जानहु तब उजियार,होय जब मानस मन्थन।।

बौद्ध कहे नहिं बुध बने,नीच कहे नहिं नीच।
करनी कथनी एक ते,कमल खिलाते कीच।।
कमल खिलाते कीच,नाम चाहे हो स्वामी।
बहुतेरे बहुरंग, भेष धरि घूमहिं कामी।।

मर्यादा की खान है ,रघुपति का गुणगान।
क्षमाशील करुणानयन, रघुवर कृपानिधान।।
रघुवर कृपानिधान,गान तुलसी जो कीन्हो।
स्वामी सम दशग्रीव,अंततः एकदिन चीन्हो।।

गुरु ते गुरुतर हो गये, बाल्मीकि जपि राम।
गुह शबरी सुग्रीव हनु, सबके पूरनकाम।।
सबके पूरनकाम, बेर भिलनी के खाये।
भेंटे हरषि निषाद,”उदय”गुन बरनि न जाये।।
– डॉ.उदयराज मिश्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!