
अभावों में पला बढ़ा मेरा बचपन,
बड़े-बड़े सपने देखा करता था।
घर में खाने को रोटी ना हो पर,
बुलंदियों को छूना चाहता था।
बचपन में देखे गये सपनों को,
सच करके दिखलाना था।
रास्ते का नामोनिशान नहीं था,
पर मंजिल तक जाना था।
दिल में उम्मीद की लौ जगा कर,
कदमों को आगे बढ़ाया था।
फूलों ने कभी कद्र नहीं की,
कांटों से ही रिश्ता बनाया था।
जमाने की आंधी ने रोका हर बार,
पर कदम मेरे डगमगायें नहीं।
ऐसा कोई ख्वाब नहीं था जिंदगी में,
जैसे हम पूरा कर पाए नहीं।
सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र



