साहित्य

पेड़ की अभिव्यक्ति

डॉ रामशंकर चंचल

वह अक्सर मुझे लेकर
दोनों पेड़ बाते करते हैं
सचमुच बहुत ख्याल रखते हैं
आज किसी कारण से
में शाम को नहीं जा सका
वहां दोनों ही मिल चिंतन थे
आज नहीं आया
वह फ़कीर एक ने
दूसरे से कहां
दूसरा बोला , हां मैं भी
यही सोच रहा था
वह फ़कीर कितना
अजीब इंसानियत है
पैरों में दो रंग के
मोजे पहने अक्सर
चला आता है
ढीला ढाला शर्ट पहने
ऐसा ही पेंट पहने
अपनी ही मस्ती में मस्त
बेगानी चाल से
धीरे धीरे चलता हुआ
जब मं हुआ
हमारे पास चला आता है
कितना सुकून महसूस करता है
वह हम से मिल
सचमुच बहुत प्यार करता है
दूसरा बोला
पहले ने पूर्ण सहमति जताते हुए
कहां, सही कह रहे हो
कैसे दोनों हाथ जोड़ कर
हमें दिल से वंदन करता है
और एक सुकून भरी
सांस ले बैठ जाता है
हमारे चरण में
सचमुच बहुत मासूम दिल और संवेदना से भरा होता हैं वह
मानव मात्र कल्याण सोच और चिंतन लिए सदा ही सभी के लिए
प्रार्थना करता है
ईश्वर भी कभी कभी
कैसे देवत्व इंसान बना देता है
दुनिया में अथाह भीड़ में
राग, द्वेष जलन , ईर्ष्या
जीते हुए लोगों के बीच
जीता सदा ही खुश रहता हुआ
सारे दुःख ,दर्द
लिख कर सुकून महसूस करता
चल देता है फिर
उस भीड़ में
जो उसे कभी रास नहीं आईं
मैं अक्सर उसे लेकर
बहुत चिंतित रहते हूं
हां चिंता तो उसकी मुझे भी
सदा ही बनी रहती हैं
तभी दूसरा बोला
वह आ गया देख
कितना उदास है न
जरूर कोई फिर आज
उसे दुःखी कर गया
जैसे ही में उनके
करीब तक चला गया
दोनों चुप हो
मुझे निहारते रहे
ओर मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना करते
तभी उनकी प्रार्थना सुन
ईश्वर एक अजीब
सूख सुकून लिए
आशीष देता है और
मैं उन दोनों के बीच लगी
सीमेंट की कुर्सी पर दस्तक देता
बैठ जाता हूं
अजीब राहत महसूस करता
मुझे सुकून महसूस करते
दोनों पेड़ बहुत ही
सुकून महसूस करते हैं और
हम मिल कर
मानते हैं जीने का
जश्न दुनिया के मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्राणियों के लिए
सुख सुकून और आनंद की
प्रार्थना करते हुए
अजीब राहत महसूस करते हुए

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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