साहित्य

मोबाइल की रोशनी में खो गय दिन

कुलदीप सिंह रुहेला

मोबाइल की रोशनी में खो गए ये दिन हमारे,
हंसते चेहरे चुप हुए, बन गए सब बेचारे

कविता:
सोशल दुनिया चमक रही, सच की धुंधली छांव,
पास बैठकर दूर हैं अब, ये कैसा है गांव।
माँ की बातें छूट गईं, दादी की वो कहानी,
स्क्रीन ने चुरा ली हमसे बचपन की निशानी।

दोस्ती अब लाइक में है, प्यार हुआ ऑनलाइन,
दिल की सच्ची धड़कन भी बन गई है टाइमलाइन।
बच्चे खेलें कम अब, उंगलियों का खेल,
मिट्टी से जो नाता था, हो गया वो फेल।

आंखों में थकान है, मन में अजीब खालीपन,
हंसते इमोजी छुपा रहे अंदर का कंपन्न।
सच से ज्यादा दिखावा अब बन बैठा पहचान,
फिल्टर वाली जिंदगी में खो गया इंसान।

मुस्कानों की जगह अब स्टेटस बोल रहे,
दिल के सारे जज़्बात अंदर डोल रहे।
समय जो था परिवार का, स्क्रॉल में बह गया,
बातों का वो रिश्ता भी नोटिफिकेशन कह गया।

चलो संभालें आज ही, ये रिश्तों की डोर,
वरना बचपन खो जाएगा, लौटेगा ना और।
थोड़ा मोबाइल कम करें, थोड़ा दिल से मिलें,
अपनों की उस गर्मी में फिर से हम खिलें…!

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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