
नौटंकी में विदूषक क परम्परा
(जोकर,विदूषक,सूत्रधार,भाँड या रँगारंगोली)
जइसे रंगमंच के प्रस्तुतियन में सूत्रधार क भूमिका
अहम होले उ बीतल संदर्भन के अइसे जोडे़ला जइसे
सब कुछ घटित हो रहल बा,वइसही आधूनिकनौटंकी में नटनटी क भूमिका होले।रँगीरंगा जेके लोक संदर्भ में जोकर भी कहल गइलबा क भूमिका भी शेशर होला। एक ओर जहाँ इ पात्र कथा के आगे विस्तारित करेला ओहीं अपने हरकत अउर गायकी से मनो रंजन,त कबोकबो सामयिक व्यंग आ तंजभी करेला।दर्शकन के एकर जइसे इंतजार रहेला।नौटंकी में विदूषक कवि के संगे साथे कोरस अउर सूत्रधार क
भी भूमिका निभावेला।एही सूत्रधार के जोकर इया मस्खरा त कहीं कहीं”पिस्सू”भी कहे जाये क रिवाज
रहल।वाकई में इ नौटंकी खेला क एक महत्वपूर्णपात्र
होला। इ मस्खरी के साथेसाथे अभिनय अउर नृत्य में
भी कुशल होत रहल।जरुरत पड़ले पे इ नौटंकी के
कउनहूँ पात्र क रोल भी बखूबी अदाकइले क सामर्थ्य रखत रहल।सूत्रधार जहाँ संस्कृत नाटक अउर हिन्दी रंगमंच खातिर कथानक इया बीते संदर्भन के(जउन
मंच पे दिखावल नाहीं जात बा)जोडे़ खातिर दर्शकन
के एक आधार देला,पारसी थियेटर मेंभी एकर प्रयोग दिखाई पडे़ला। लोक मंच खास तउर पे नौटंकी में
विदूषक इया जोकर क हाजिरी बहुते जरुरी होला।
बहुत सूझबूझ अउर सधल सधावल अभिनेता ही एह
किरदार के निभा सकेला। गायकी में भी इ सिद्धहस्त
होला,हाजिरजवाबी एकर विशेषता कहेके चाहीं,तंज इया व्यंग एकरे मूल में होला। अपने व्यंग से इ
“समझदार की मौत” वाली कहनाम चरितार्थ करत रहल ह।अपने रौ में अइले पे इ केहू केभी अपने व्यंग
अउर हाजिर जवाबी से काठ मार देत रहल। वास्तव में सलीके से कहल गइल व्यंग बहुत मारक होला।
समाजिक,आर्थिक,राजनैतिक, धार्मिक सरोकारन आ ओकर खामी ओघारे क एक लमहर रिवाज रहे।
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व्यंग के हवाले से ‘हरशंकर’ परसाई’ क कहल हकि-
“व्यंग जीवन से साक्षात्कार आ,जीवन क आलोचना
करेला,विसंगतियन,मिथ्याचारन,आ पाखण्डी क
पर्दाफ़ाश करेला।”शरद जोशी क मानना हकि-“सेंस
आफ ह्यूमर”अन्याय,अत्याचार,आ निराशा के विरुद्ध
होले से व्यंग में प्रकटे ला अउर जहवाँ ‘रविन्द्र नाथ त्यागी’ कुरीतियन क भण्डाफोड़ क खातिर व्यंग आ
हास्य क एगो हथियार मानेलं,ओहीं ‘श्रीलाल शुक्ल’ क मानना ह कि -“मैनें व्यंग को आधूनिक जीवन और
आधूनिक लेखन की एक अभिन्न अस्त्र और एक अनिवार्य शर्त के रुप में पाया है।”व्यंग आ हास्य के
संदर्भ क एक चटना आ अनुभव से इहाँ साझा कइल
जरुरी लागत बा। प्रयाग क साहित्यकार आ हमार खास मित्र हितैषीजी(अब दिवंगत)एक प्रसंग मेंसाझा
क इसे रहलन कि उ मडियाहू/जौनपुर में एक बरात में रिश्तेदारी में गइल रहलन,एक बगिया में बरात क
जनवासा रहल,रात दस बजे से नौटंकी भी नथाइल रहल-“रानी सारंगा”।कउनो खास प्रस्तुति नाहीं रहल,
काहेकि देखवइया भी कम रहलन। बकी आधी रात के बाद, नगाड़ा क आवाज सुनिके धीरे धीरे कमोबेश
५०-६० जने बतौर देखवइया आके बइठ गइल रहलं,
जोकर क किरदार निभावेवाला कउनो ‘सुरजू’ नाम क
एक आदमी पूरे खेल क शमाँ बाँध रखने रहल।आम
तउर पे शादीबियाह में गवैया आ बजवैया के सबके बादमें खिलायेपिलाये क रिवाज रहल ह।शायदसब्जी क कमी रह गइल रहल,ऐसे घरवाले पानी डारके रसा
बढ़वा देहलें,नमक आ मिर्च मसाला भी डरवा देहलें।
नौटंकी क कुछ कलाकार भी अंतिम पंगत में रहलं,इ
अंतिम पंगत में ‘सुरजू’ जोकर भी रहल।सुरजू क मंच
पे बेसब्री से इंतजार होत रहल,बारबार,लाउडस्पीकर से,हरमुनियम मास्टर,सुरजू के जल्दी आवे क निहोरा
करतरहलं।थोड़ी देर बाद सुरजू मंचपे नमूदार भइल।
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हारमोनिया मास्टर मंच पे ही ओकरे सामने एक पात्र के तरियन ठाढ़ भइल अउर लगल ओके डाँटे–
अबे!’सुरुजुआ कहाँ मर गइल रहले,बाबू साहब कब से खेला शुरु करे के कह रहल बांँटे,’अबे इतने देर से
भोजन करत रहले,पुरहर पाँत त कबही उठ गइल।’
–‘मास्टर जी! अब का बताईं आप लोगन से।’
–‘अबे! ऐमें शरम क कउन बात हवे,कौनो लौंडिया ह कि तोके शरम लागत बा। ‘
–‘अरे जाये देईं मास्टर साहब! नाक कटि जाई। ‘
सुरुजुआ –‘का बताईं मास्टरजी!तरकारी रस में आलू
हेरत रहलीं कि शायद एक टुकड़ा मिल जा,एही से देर हो गइल मास्टर!
देखीं कउन बारीकी,संकेत अउर हास्य के जरिये
उ आपन बात केतना सरलता से कह के धो डरलस,
बाबू साहब के,लोग खूब आनन्द उठइलन इ बात क।
जेकरे इहाँ बरात गइल रहल ओहू अगली कतार में ही
बइठल रहलन।उनहूँ पे घड़न पानी पड़गइल।चुपचाप
उ उहाँ से खिसक लेहलन।दूसर सब्जी बनवा के बारी
बारी से नौटंकी के उपेक्षित लोककलाकारन के खाना वगैरह खिअइलन ।
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन “



