
हरितिमा की चादर ओढ़ वसुधा इतराती है।
रंग-बिरंगे फूल खिलें जो, बगिया महकाती है।
गेहूँ के खेतों में फूली सरसों आभा पाती है।
नार-नवेली मन में सोचें हम ऐसा ही रूप बनाएँ,
सखियों संग मिल ओढ़, पीली चुनरिया आएँ।
हरियाली संग मिल पीली ‘सुषमा’,
वसुधाई आतप में लहराएँ,
उल्लसित मनोभावनाएँ,
स्व प्रियतम को लुभाएँ।
यह ऋतु है बड़ी निराली,
श्रांत-क्लान्त दु:खियारों को भी,
अपने संग खुशियों में लिपटाए।।
सुषमा श्रीवास्तव,रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




