
वो शर्मीला सा इक लड़का ,,
वो चेहरे का भोलापन ।

मन्द मन्द मुस्कान थी उसकी ,
दिल छू लेती बांकी चितवन ।
शायद कुदरत ने भेजा था ,
पिछले युग की प्रीत निभाने ।
मैंने भी पहचान लिया था ,
जनम जनम का मीत पुराना ,
फिर कोई कैसे ना जाने ।
पुनर्मिलन ने याद दिलायी ,
पिछले युग की सारी बातें ।
युगों युगों का साथी ही था ,
साथ बिताए दिन औ रातें ।
वो इक राजा मैं इक रानी ,
और प्यार की सब सौगातें ।
दूर तलक देखा करते थे
इक दूजे को आते जाते ।
पंख लगाकर प्यार उड़ा जब ,
तूफानों ने कहर मचाया ।
अटल ,अलौकिक ,अनुपम बन्धन,
उसको कौन अलग कर पाया ।
तूफानों को सबक सिखाया ,
सबको गिन गिन छाँट हटाया ।
जनम जनम का साथी ही तब,
इक दिन दूल्हा बन घर आया ।
नयनों की डोली मे बैठा ,
मुझको अपने घर ले आया ।
वो शर्मिला सा इक लड़का ,
कदम कदम पर साथ निभाया ।
जिसने दिल से सदा लगाया ।
लेकिन मन ये समझ न पाया ,
,,उस दिन,,सबने हाँथ छुड़ाया ??
सब पागल थे, नही जानते ,
रूहों से रूहों का संगम ,
कौन जुदा अब तक कर पाया??
वो शर्मिला सा इक लड़का ,
जाकर भी फिर जा ना पाया ।
अब भी है वो मेरा साया ।
मेरे मन मे सदा समाया ।
सुषमा दीक्षित शुक्ला



