साहित्य

पत्रकार की कलम

महेजबीन मेहमूद राजानी

कागज काला कर देने भर से पत्रकार नहीं बन जाता है
सत्ताधारी की मुस्कानों में सच यूं ही दम तोड़ जाता है
जो झूठ को भी हक की चादर दिखाए वो कलम शर्माती है
और बेच दिए जाए शब्द वहां खबर खो जाती है.
किसने कहा कि मंच पे बैठकर चीखना पत्रकारिता है?
सच को घुमा फिरा कर बेचना कोई नई करामात नहीं है.
जो जनता की पीड़ा को माप न पाए वो क्या खबर लिख पाएगा?
जिसका तराजू झुका हुआ उसका हर शब्द बिक जाएगा.
अमीर की तारीफ़ में जो सुबह शाम तिलक लगाए बैठे हैं
गरीब के आंसू को भी रोटी की तरह तौलते बैठे हैं
निष्पक्षता की चौखट पर जो कदम हिचकिचाए खडे हों
उनके हाथों में कलम नहीं बस बिखरे हुए साए पड़े हों.
समाज तभी सुधरेगा जब खबरें डर से आजाद रहेंगी
सच की लौ सत्ता के आगे भी सीधी खडी रहेगी.
पत्रकार वो है जो आईना रखकर दुनिया को दिखलाता है
वरना चाटुकारिता का धंधा तो हर मोड़ पे बिक जाता है.

महेजबीन मेहमूद राजानी
सड़क अर्जुनी
9423415191

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