साहित्य

रात

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

भोर लालिमा जब छा जाती, सारा जग तब प्रमुदित होता।
अपनेपन के लिए भावना, अरुणोदय तम को है धोता।।

निकल नीड़ से विहग सभी हैं, पंक्तिबद्ध हो नभ में उड़ते।
चीं-चीं चूँ-चूँ कलरव करते, मनभावन वे अतिशय लगते।।

मोती सी शबनम बूंँदो को दिनकर गायब कर जाते हैं।
मुकुलित कलियांँ सब खिल जाती,उन पर भंँवरे मँडराते हैं।

निकल घरों से प्राणी सारे,चहुँ दिशि श्रम में हैं लग जाते।
दिन भर हैं कर्तव्य निभाते, लौट शाम को सब घर आते।।

फिर आती है रात सुहानी, आराम बहुत सबको देती।
दिन भर की जो पीड़ा होती, पल भर में सारी हर लेती।।

चांँद सुहाना मनहर लगता, धवल चांँदनी जग बिखराता।
उडुगन भी नभ में सज जाते ,चकवा निशिभर शोक मनाता।।

कभी रात छोटी होती तो बड़ी कभी ये हो जाती हैं।
सबको अपने बस में करके, अपनत्व भाव दिखलाती है।।

मीठे सपनों में खोकर के,सुख की निद्रा में सब सोते।
कुछ सपने हैं लगे अधूरे,कुछ दिखते हैं पूरे होते।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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