साहित्य

रे पंक्षी उन्मुक्त गगन के

उदय किशोर साह

रे पंक्षी  तुँ उन्मुक्त     नील गगन के
विचरण करती हो     साथ पवन के
चोंच से चुग कर     लाती हो   दाना
तेरी जिन्दगी का    यही है  खजाना

पेड़ों की डाली      पे तेरा है    बसेरा
झुरमुठ में चहचहाती हो नित्य सवेरा
अपनी खिड़की से नित्य तुम्हें निहारू
तुम से सीख ले खुद की जीवन संवारूँ

धन दौलत की नहीं तुम्हें कोई  भी चाह
पेट भर दाना की है चाहत की       राह
जमीन जायदाद की ना है तेरी   अरमान
तेरी दुनियां का दौलत है नीला आसमान

नील गगन का तुँ है चक्रवर्ती एक राजा
तेरी चहचहाहट में छुपी है   मधुर बाजा
तुमसे सीखना है हमें तेरी उत्तम संस्कार
नहीं करती हो तुम किसी से कोई तकरार

काश ! मैं भी तेरी तरह होता एक परवाज
नील गगन पे उड़ता बन कर मैं भी    बाज
आजादी का होता तब अपना ही       राज
हँसत्ता खेलता होता मेरा भी दिन का काज

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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