साहित्य

सृष्टि की जननी

ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

आज की नारी नहीं बेचारी,पुरुषों पर भी वह है भारी।
कोई नहीं विभाग है ऐसा,जिसमें कार्यरत न हो नारी।।

पढ़ लिख समझदार बनी,जिम्मेदारी ये निभाती सारी।
तीनों सेना में आज वह भर्ती,कर्तव्य निभा रही नारी।।

प्रभु ने है उसे नवाजा जग में,दे अद्भुत प्रजनन शक्ति।
घर गृहस्थी के संचालन में,महत्वपूर्ण वो नारी शक्ति।।

यह स्त्री ही तो है केवल,संपूर्ण सृष्टि की जननी शक्ति।
शिक्षक प्रशिक्षक खिलाड़ी,कर्मवीर योद्धा जनशक्ति।।

शिक्षित पुरुष-स्त्री दोनों कमाएं,उसमें भी नारी महान।
बिन नारी के हर घर आँगन,सूना जाने सकल जहान।।

नारी देवी माँ बहन बेटी बहू पत्नी,श्रद्धा शक्ति प्रधान।
जीवन में सदा इनकी कद्र करें,कभी न करें अपमान।।

कामवासना की दृष्टि से,मत देखें कभी कोई भी नारी।
राह दिखे संकट में कोई तो,मदद करें मिल नर-नारी।।

भाई बंधु पिता पुत्र मित्र,रक्षक-सा कार्य हो उपकारी।
हरेक घर गाँव समाज शहर में,होते हैं ये परोपकारी।।

गृहलक्ष्मी सा मान जहाँ नारी का,उस घर लक्ष्मी वास।
लक्ष्मीजी का वास जहाँ हो,कभी करे न वो उपवास।।

शक्ति स्वरूप माँ लक्ष्मी-नारायण,उसी हृदय के पास।
इस निर्मल अंतर्मन में भरा है,यह एक पूर्ण विश्वास।।

:
ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.

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