
तारा गण में रवि श्रेष्ठ तो,साधू संतों में रविदास
सारे जग को जगमग करे,रवि और संत प्रकाश
गुरु संत रविदास सो ,जग में पायो एक
धन्य धन्य रग्घू घुरबिनियां, जन्मो रवि विवेक
ज्ञान गंग बहती सदा ,पल में दे आनन्द
धन्य धन्य हे भाग्य रवि ,गुरु पायो रामानन्द
नहीं अजूबी बात सों,रवि संत सम अनंग
कगंन डूबो न मिलो ,मिलो कठौता गंग
कण कण में भगवान हैं, जो मन में बसे उमंग
छिन भर में पाप कटें, संतो का हो सत्संग
ईश्वर तो बस एक है, सबका मालिक एक
आडम्बर ओ पाखंड सब, कर्म नहीं हैं नेक
सत्कर्म ही पूजा श्रेष्ठ है, नेक कर्म में रहो निमग्न
मन चंगा तो सब भला ,बसत कठौता गंग
कर में ले दीप जो ,जग में खोजो जाय
संत शिरोमणि रविदास सो, मन मन्दिर मिल जाये
शब्द शब्द में ज्ञान का,भरपूर भरा भंडार
सत्य ,अहिंसा,समभाव ही था ,मुख्य आधार
क्रांतिकारी परिवर्तन के जनक,दीन दलितों के दिनमान
हिंद धरा अति धन्य हुई ,पाकर रवि संत महान।
रचनकार — सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा
स्वरचित, मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित



