
महाभारत की कथाएंँ हैं अद्भुत प्रसिद्ध,
उसमें भी है द्रौपदी का अक्षय-पात्र,
था ऐसा चमत्कारिक,
कोई भी भूखा न जाए,जो द्वार पर आए।
चलो सुनाएं उसकी कहानी,लेखनी की ज़ुबानी।
पाण्डवों से वनवास में मिलने आते ऋषि-ज्ञानी।
वन-वन घूमते पाण्डवों को आतिथ्य में होती बड़ी परेशानी।
कुल-पुरोहित से प्रेरित हो,की युधिष्ठिर ने सूर्योपासना।
फलत: मिला वरदान में, अक्षयपात्र एक चमत्कारिक,
ले जाकर सौंप दिया, सौभाग्यवती द्रौपदी सुसंस्कारी को।
उस अनुपम पात्र से तब तक सबकी आपूर्ति होती रहती,
जब तक भोजन स्वयं न करती परोसने वाली सुलक्षणी।
भोजनोपरान्त द्रौपदी के एक दिवस ऐसा आया,
ऋषिवर दुर्वासा मण्डली का आगमन बेवक्त हुआ।
फिर आई दुर्धर्ष समस्या आतिथ्य – सत्कार की।
क्या न करती,लगा दी गुहार अपने आराध्य की।
भागे-भागे माधव आए, आराधिका की सुनने को,
पर बोले- मैं भूखा हूँ भोजन लाओ,जो कुछ है ले आओ।
अश्रुपूरित नेत्रा – द्रौपदी खाली अक्षयपात्र ले दौड़ी आई,
केशव ने चमत्कारिक अक्षयपात्र में अन्न का इक दाना पाया ,
जिसको ले झट अपने मुख में डाला, डकार लगाई,
उधर दुर्वासा ऋषि -मण्डली के आतिथ्य की हुई भरपाई।
इस तरह द्रौपदी के अक्षयपात्र रहते कोई भूखा-प्यासा न रहा।
यही तो विशेषता-विश्वसनीयता थी उसने पाई।।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




