
श्रेष्ठ जगत में शिक्षक होता,अक्षर-अक्षर ज्ञान कराता।
शिष्यों की प्रतिभा निखारकर,मंजिल तक उनको पहुँचाता।।
अध्यनरत होकर ही शिक्षक,शिक्षार्थी को पाठ पढ़ाते।
ज्ञानदीप की ज्योति जलाकर,सोई प्रतिभा सदा जगाते।।
दर्शन का चिंतन मंथन कर,नई दिशा समाज को देते।
शुचि दर्पण दिखला करके वो,आत्मसात सबको कर लेते।।
शुचि ग्रन्थों वेद पुराणों के,मंत्रों को मानस में भरते।
नव विकास की थाम तूलिका,भावों का अवगुंठन करते।।
शिक्षा तो सर्वोपरि होती, अखिल विश्व में पूज्यनीय है।
जो भी हुआ महान धरा पर, वही सदा अभिनंदनीय है।।
शिक्षक भव्य राष्ट्र निर्माता, भावी पीढ़ी वही बनाते।
अपनी निष्ठा कर्मठता से, देश भक्ति उनमें भर पाते।।
शिक्षक किताब का कीड़ा बन,शिष्यों का भाग्य संँवारे।
बच्चों में बच्चा बन करके, अपनी अनुपम सुरभि पसारे।।
छात्र किताबी कीड़ा बनकर, ऊंँचे-ऊँचे पद पा जाते।
गौरव यश सम्मान बढ़ा कर, सारे जग में नाम कमाते।।
बनें चिकित्सक अरु वैज्ञानिक, जीव जंतु के प्राण बचाते।
हैं विकास की धुरी वही जो, कभी न अपना समय गँवाते।।
पाकर उच्च पदों को बच्चों, मात-पिता गुरु कभी न भूलो।
आशीर्वाद प्राप्त कर उनका, उच्च शिखर को तुम सब छू लो।।
डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश



