साहित्य

श्रंगार

आशा बिसारिया

प्रेम राधा का हो चाहे मीरा का हो,
भावना मन की पावन सदा चाहिए,
वो मिले ना मिले ,सामने हो ना हो
मन के दर्पन में बंधन सदा चाहिए
प्रेम……
जब विरह ताप मन को जलाता रहे
मीत बिछड़ा हुआ याद आता रहे ,
मंद शीतल हवा चाहे कितनी बहे
पर फुहारों का सावन सदा चाहिए
प्रेम……..
याद उनकी बनी मंद शीतल हवा
सामना मेरा सुरभित शरद से हुआ,
भर गयी मेरे तन-मन में मीठी छुअन
ऐसी पूनम ‘शरद ‘ की सदा चाहिए
प्रेम……
सब जगह है उजाला दमकते दिए
सब मनाते हैं उत्सव रंगोली किए
तेरे स्नेह से मन का दीपक जला
सौरती का दिया वो सदा चाहिए
प्रेम ……..
सब उड़ाते हैं रंग और अबीर यहां
कैसे खेलूं मैं होली सजन के बिना
ये विरह की अगन होलिका बनगयी
कोई मिलन का बहाना सदा चाहिए
प्रेम………..
आशा बिसारिया चंदौसीउ.प्र.

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