
श्याम रंग में रंग चुकी मैं ।
सब करते हैं मुझ पर हासी,
जग की बातें भूल चुकी मैं ।।
पात -पात में कान्हा दिखता,
बाग बगीचे घूम चुकी मैं ।
किस बगिया में कान्हा मिलता,
ऐसी सुध -बुध भूल चुकी मैं ।।
बचपन मैंने जहांँ गुजारा,
उन गलियों को छोड़ चुकी मैं ।
वृंदावन की गलियां घूमूंँ,
मथुरा काशी भूल चुकी मैं ।।
सखियों के संग खेल रचाया,
उन सखियों को छोड़ चुकी मैं ।
हर बाला में राधा दिखती,
सास ननद को भूल चुकी मैं ।।
भूख प्यास का पता नहीं है,
श्री चरणों में शीश झुकी मैं ।
हर नर में नारायण दिखता,
प्रीतम को भी भूल चुकी मैं ।।
सपने में भी कान्हा आता,
बात बताना भूल चुकी मैं ।
श्याम नाम का चंदन घिसती,
श्याम रंग में रंग चुकी मैं ।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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