
राम-नाम की छाया में ही, सिया का जीवन सार हुआ।
बिन रघुनंदन एक पल भी, हर सुख उन्हें उधार हुआ॥
अशोक वन की शीतल छाया, अश्रु-सलिल बन जाती थी।
पर मन में विश्वास जगा था, धैर्य-दीप जल जाती थी॥
धूप-छाँव में भी जो न डोले, वही चरित्र उदार हुआ।
बिन रघुनंदन एक पल भी, हर सुख उन्हें उधार हुआ॥
भय दिखा कर, लोभ जगा कर, दुष्टों ने हर यत्न किया।
पर मर्यादा-पथ से सिया ने, पग अपना न कदापि हिला॥
नारी शक्ति का यह स्वरूप, जग के लिए आधार हुआ।
बिन रघुनंदन एक पल भी, हर सुख उन्हें उधार हुआ॥
स्मृति में बसकर रघुवर हर क्षण, कष्टों को सह जाती थीं।
आस्था के दीप उजाले में, रातें कट जाती थीं॥
धैर्य बना जब शस्त्र सिया का, अधर्म स्वयं लाचार हुआ।
बिन रघुनंदन एक पल भी, हर सुख उन्हें उधार हुआ॥
आए प्रभु जब संकट हरने, करुणा ने आकार लिया।
पतिव्रता की पावन गाथा, राम-हृदय में उतार लिया॥
सिया-चरित से जग ने जाना, प्रेम सदा अवतार हुआ।
बिन रघुनंदन एक पल भी, हर सुख उन्हें उधार हुआ॥
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




