साहित्य

तुम थी तो सब कुछ था

डॉ रामशंकर चंचल

तुम थी तो
नव वर्ष था
दिन था, दोपहर थी
शाम थी और रात थी
सब का अहसास था
तुम थी तो
क्या नहीं था
सब कुछ था
खाना था पीना था
वक्त था, बातें थीं
सुख और सुकून था
हंसना और हंसना था
बातों का सैलाब था
नदी थी पहाड़ था
आसमां था पक्षियों का
कलवर था पतों का संगीत था


तुम थी तो
कितना कुछ था
जीवन था, रस था
रंग था ,रूप था
आंखें थीं , चमक थी
रौशनी थीं, खुशियों का
साथ था, सुकून का अहसास था
क्या नहीं था
सब कुछ आस पास था
जीवन की परिभाषा थीं
जीवन सार्थक था
जीवन पूंजी था
साहित्य था, कला थीं
चित्र था चित्र में यादें थीं
सड़क थीं और दौड़ते वाहन का
शोर था, कितना कुछ था
क्यों कि तुम थीं
जब से तुम चली गई
कुछ लगता ही नहीं
कुछ है
सब कुछ तो शून्य सा है
जैसे कुछ है ही नहीं
केवल में हूं और बाकी सब कुछ
तुम ले गई
अपने साथ और मुझे
अकेला छोड़ गई
जब दिल ही आत्मा ही
नहीं रही तो कुछ है
का कैसे अहसास होगा
बताओ ना तुम
कब लौट कर आ रही हो
ताकि सब कुछ
लौट आए और
जीवन जी रहा हूं
तुम्हारे साथ ,पास
सब कुछ महसूस करता
और कि तरह मैं भी
सुख सुकून और आनंद का अहसास
करता हुआ
पता नहीं कब लौट आयेगा
यह जीवन जो
तुम ले चली गई और
शून्य के साथ
जीवन को जीने के लिए
मजबूर कर गई
आखिर कब तक
शून्य को जीवन मान
जीना चलना और दौड़ना
होगा नहीं जानता
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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