साहित्य

विश्व कैंसर दिवस

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

नशा छोडते नहीं हैं लोग, बीमारी को भोग।
कैंसर जैसा दुखदायी ये, हुआ भंयकर रोग।

जीवन बर्बाद करे सबका, दुखी रहा परिवार।
दौलत इसमें डूब रही है, जीवन रहा न सार।
बद से बदतर मौत हुई है, जीवन होता नर्क।
एक छिदाम भी पास रहे न, होता बेड़ा गर्क।
नहीं देता है समय किसी को, रहना सभी निरोग।
कैंसर जैसा दुखदायी ये, हुआ भंयकर रोग।।

बीड़ी सिगरट तंबाकू से, कैंसर पनपे रोज।
शराब पीकर गिरा रहे हैं, मुख मंडल का ओज।
सदा परिवार बेचैन रहे, दबा कराते सोच।
अभी समय है संभल जाओ, बनो नहीं तुम पोच।
इस बीमारी बचना यारो, नशा छोड़ कर योग।
कैंसर जैसा दुखदायी ये, हुआ भंयकर रोग।।

सबका भविष्य सुनहरा बने, सुखी रहे संंसार।
जग से कैंसर दूर करो ये, तब जीवन आधार।
पहले ही जब पता लगे तो, सभी हो सावधान।
नशा छोड़ कर दबा कराओ, प्रण लेना यह मान।
आये दुख ये नही किसी पर ,जीवन है संयोग।
कैंसर जैसा दुखदायी ये, हुआ भंयकर रोग।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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