साहित्य

विविक्ता में न होते तुम..

मीनाक्षी शर्मा 'मनुश्री'

कितने विशाल कितने हो सुन्दर
व्यापकता के उदाहरण हो समंदर
कभी उल्लसित तो कभी हो शांत
अमर्ष कभी तो कभी होते एकान्त

क्यों है तुम्हारा यह एकाकीपन
कुछ कहते नहीं क्यों है खिन्न मन
क्या कुछ छिपाए बैठे हो समंदर
ये तो बताओ तुम अपने अन्दर

आकृष्ट होती नदियाँ तुम्हारी ओर
तारल्य से दौड़ी चली जाती उस ओर
अनुभव करना चाहती वें अपनापन
पर उनको मिलता केवल खारापन

विस्तृत तो बहुत अधिक हो तुम
बृहत पर एकाकी में,फिर भी तुम
अच्छा होता यदि खारे न होते तुम
इस तरह विविक्ता में न होते तुम

मीनाक्षी शर्मा ‘मनुश्री’

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