साहित्य

वो अपना शहर

प्रिया काम्बोज प्रिया

वो अपना शहर जो कल तक अपना था
क्यों आज वो अपना शहर लगता बेगाना है
जिस शहर गली बीता बचपन जन्म लिया था
क्यों आज फिर वो अपना शहर अनजाना लगता है
बदल गये दर ओ दीवार अपने ही मकां की
आज वो सपनों से सजा घर अपना सा लगता है
कुछ निशां आज भी बाकी है उस घर में
बीते बचपन की किलकारियां उस घर में
चौराहे गलियां सब बदली बदली लगती है
अब तो अपने संगी साथी भी अजनबी लगते हैं
कहां गुम हो गया वो अपनो का अपनापन
आज हर कोई क्यों गैर सा लगता है
शोर शराबा रहता था हर तरफ हर घर
आज वो घर गलियां क्यों बेमानी ही लगती है
रहता मन में सब एक ही सवाल सर पल
क्यों ,क्यों अपना ही घर अब घर नहीं लगता
मेहमान सा बन जाते अपने ही शहर में अब
अपना वो शहर अब अपना नहीं लगता

प्रिया काम्बोज प्रिया ✍️ स्वरचित कविता
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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