साहित्य

यादों का सौदा

डॉ.उदयराज मिश्र

जहां हमारा जन्म हुआ था,जहां लिए किलकारी।
जिसके आंगन नहला नहला,पुलकित थी महतारी।।
आज उसीघर पर लिक्खा है-यह मकान बिकाऊ है।
बेंच रहा अपना ही कोई,नाम भी जिसका बाऊ है।।

बूढ़ा बाप मरा जिसदिन ही,पहला काम किये हैं।
मरघट पर सौदागर खोजे,औ ऐलान किये हैं।।
कौन यहां अब रहने वाला,यह घर बहुत उबाऊ है।
बेंच रहा अपना ही कोई,नाम भी जिसका बाऊ है।।

जर्जर दीवारों में जिसके, कण कण प्यार भरा है।
उससे पूंछो कबकब किसने,उसका दर्द हरा है।।
स्मृतियों के मनसपटल पर,जो कितनों का ताऊ है।
आज उसीघर पर लिक्खा है,यह मकान बिकाऊ है।।

बेंचबांचकर शहर बस रहे,आज जिसे मतवाले।
चकाचौंध में भूल चुके हैं ,बन्द कर चुके ताले।।
बेंच रहा अपनी यादों को ,गैर नहीं वो बाऊ है।
आज उसीघर पर लिक्खा है,यह मकान बिकाऊ है।।
– डॉ.उदयराज मिश्र
9453433900

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!