साहित्य

धर्मवीर भारती: एक महान पत्रकार की कहानी

डॉ. सीमान्त प्रियदर्शी

धर्मवीर भारती जी के साथ लम्बे समय तक ‘धर्मयुग’ में सह संपादक की भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार सुनील श्रीवास्तव जी के संपादन में आई पुस्तक ‘धर्मवीर भारती की शख्सियत एवं पत्रकारिता’ महत्वपूर्ण है। हालांकि इस पुस्तक के तीन संपादक हैं – रविन्द्र श्रीवास्तव, सुनील श्रीवास्तव एवं टिल्लन रिछारिया। इनमें से रविन्द्र जी और सुनील जी का एक लम्बा अनुभव डॉ धर्मवीर भारती जी के साथ रहा है। जो इस ग्रंथ की सामग्री को विश्वसनीय और गंभीर बनाती है। इस पुस्तक के संपादक सुनील श्रीवास्तव जी कहते भी हैं कि ‘इस बात को मैं खुले मन से स्वीकार करता हूँ कि धर्मयुग से ही मैंने जाना कि असल पत्रकारिता क्या होती है। किसी भी पत्रिका में प्रकाशित होने वाली सामग्री का चयन, लेखन, लेआउट, विजुअल का चयन कैसे होता है। कहने का तात्पर्य यह कि अपने समय की पत्रकारिता से न सिर्फ मैं जुड़ चुका था, बल्कि उसके तकनीकी पक्ष से भी कुछ हद तक अवगत हो चुका था।’ सुनील जी एक बातचीत का सन्दर्भ देते हुए आगे लिखते हैं कि ‘मात्र भारती जी ही ऐसे हैं जिन्होंने पत्रकारिता और लेखन अलग-अलग किया। पत्रकारिता की तो सिर्फ पत्रकारिता की और लेखन किया तो सिर्फ लेखन किया।’ भारती जी की इस खासियत ने ही उन्हें सोचने को बाध्य किया कि उनके लेखन पर तो बहुत शोध हुए हैं लेकिन उनकी पत्रकारिता पर शोध तो क्या गम्भीर विचार भी नहीं हुआ। जब कि सुनील जी के विचार से भारती जी पत्रकारिता के स्कूल थे। बल्कि उसे भारती पत्रकारिता का युग की संज्ञा दी जाय, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।”
‘डॉ. धर्मवीर भारती की शख्सियत और पत्रकारिता’ ऐतिहासिक और दस्तावेजी महत्व का कार्य है। कहते हैं कि पत्रकारिता वास्तव में एक चुनौती है, जिसके आवश्यक गुण हैं – उत्तरदायित्व, अपनी स्वतंत्रता बनाये रखना, सभी दबावों से परे रहना, सत्य प्रकट करना, निष्पक्षता, समान व्यवहार और समान आचरण, तो इन सभी मानकों पर एक साथ खरे उतरते थे पत्रकारिता जगत के प्रकाश स्तम्भ, उद्भट विद्वान, ‘धर्मयुग’ के पर्याय डॉ धर्मवीर भारती जी। ‘धर्मयुग’ का प्रकाशन बंबई में टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह से सन 1950 में प्रारम्भ हुआ था। ‘धर्मयुग’ के पहले संपादक इलाचंद जोशी जी थे। बाद में चलकर इसके संपादक हेमचंद जोशी तथा सत्यकाम विद्यालंकार हुए। लेकिन ‘धर्मयुग’ सम्पूर्ण भारत में ही नहीं बल्कि देश की सरहदों को लांघकर विदेशों में भी पाठकों के बीच लोकप्रिय हुआ तो उसका एक मात्र कारण भारती जी थे। भारती जी का विद्वतापूर्ण संपादन और लेखन था। ‘धर्मयुग’ भारत की सर्वश्रेष्ठ हिंदी पत्रिका रही है। भारती जी के निर्देशन में इसने पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की थी। व्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका होते हुए भी ‘धर्मयुग’ ने साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित किया था। अनेक लेखक इस पत्रिका की ही देन थे। एक समय था जब देश में ही नहीं विश्व के कोने- कोने में रहने वाले हिंदी भाषी बड़े चाव के साथ पढ़ते थे और इसके अगले संस्करण की बेसब्री से प्रतीक्षारत रहते थे। ये सब सम्भव हुआ था भारती जी के कारण। धर्मवीर भारती जी का हिन्दी पत्रकारिता में एक लम्बा समय गुजरा। केवल ‘धर्मयुग’ ही नहीं इसके अलावा अन्य कई पत्रिकाओं के संपादन से ये समय-समय पर जुड़े रहे। हाँ, यह अवश्य था कि पत्रकारिता में उनकी पहचान लोग उन्हें ‘धर्मयुग’ से ही जोड़कर देखते हैं क्योंकि जीवन के तीन दशक तक उन्होंने इसी पत्रिका का बेमिसाल संपादन किया था।

‘गुनाहों के देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ ‘अंधा युग’ जैसी तमाम कालजयी रचनाओं के सृजनकर्ता डॉ धर्मवीर भारती जी एक श्रेष्ठ कथाकार ही नहीं बल्कि देश की जानी – मानी पत्रिका ‘धर्मयुग’ के ऐतिहासिक संपादक भी रहे हैं । ऐतिहासिक संपादक इस रूप में कि उनके समय में इस पत्रिका ने देशभर में जो लोकप्रियता हासिल की , वह स्थिति न तो उनके पहले थी और न उनके बाद हुई। उनके संपादन से हटने के बाद ‘धर्मयुग’ धीरे – धीरे पतन की तरफ बढ़ने लगी और अंततः बंद हो गई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि धर्मवीर भारती जी एक श्रेष्ठ कथाकार और कवि तो थे ही लेकिन उनके रचनाधर्मिता एक उत्कृष्ट संपादक की भी थी। उनकी रचनधर्मिता का एक सबल पक्ष पत्रकारिता का था। धर्मवीर भारती जी के उपन्यासों, कहानियों और कविताओं पर तो काफी शोध कार्य हुए लेकिन उनके दूसरे पक्ष यानी पत्रकारिता पर कोई गंभीर कार्य नहीं हुआ। जिससे हम यह जान सकें कि आखिर उनके संपादन की वह क्या खासियत थी जिसने धर्मयुग को सड़क से संसद तक में लोकप्रिय बनाया। एक समय था जब ‘धर्मयुग’ में छपना हरेक साहित्यकार के लिए गर्व एवं सम्मान की बात थी। इन्हीं सब सन्दर्भ को समेटे यह पुस्तक विशिष्ट है।
इन्हीं सारे संदर्भों को पुस्तक में विद्वान लेखकों ने अपने लेखन के द्वारा रेखांकित किया है। पुष्पा भारती, अच्युतानंद मिश्र, उषाकिरन खान, डॉ धनंजय चोपड़ा, प्रमोद जोशी, आलोक तोमर, उदयन शर्मा, रमेश निर्मल, के विक्रम राव, शांता कुमार, विनोद तिवारी, अरविंद मोहन, विश्वनाथ सचदेव, रवींद्र श्रीवास्तव, पुष्पेश पंत, त्रिलोक दीप, चित्रा मुद्गल, सुरेंद्र शर्मा, संतोष भारतीय, बुद्धिनाथ मिश्र, महेश दर्पण, दिनेश लखनपाल, राजीव सक्सेना, चंद्रकिशोर जायसवाल, सविता मनचंदा, अनुराग चतुर्वेदी, प्रो. सुशील राकेश, टिल्लन रिछारिया, अनिता गोपेश, डॉ. सीमांत प्रियदर्शी, राजकुमार सिंह, सुरेन्द्र सुकुमार, सुनील श्रीवास्तव और अरविन्द मालवी ने भारती जी और उनकी पत्रकारिता पर उत्कृष्ट लेख लिखे हैं। इनमें से कुछ लेख उन विद्वानों के हैं जिन्होंने भारती जी के साथ संपादकीय मंडल में लेखन कार्य किया था। शुरुआत में भारती जी का बहुत ही सुंदर ललित निबंध, ‘सृजनात्मक गर्मियां इलाहाबाद की’ भी धरोहर के रूप में दिया गया है।
इस पुस्तक में धर्मवीर भारती जी के जीवन और पत्रकारिता के बारे में बहुत ही भावपूर्ण और विस्तृत चर्चा की गई है। लेखकों ने उनकी पत्रकारिता की विशेषताओं को उजागर किया है, जैसे कि उनकी निर्भीकता, प्रजातंत्र, और मूल्यहीनता के प्रति उनकी असहिष्णुता। लेखकों ने यह भी बताया है कि भारती जी ने अपने जीवन को ‘धर्मयुग’ पत्रिका के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने अपने रचनाकार रूप को भी पत्रकारिता की शुचिता के लिए बलिदान कर दिया था। दिनकर जी ने लिखा है कि ‘भारती जी ने अपने रचनाकार को बलिदान कर दिया, जिससे धर्मयुग पत्रिका को एक नए स्तर पर पहुंचाया जा सका’। इस पुस्तक में भारती जी के ऐसे व्यक्तित्व की झलक मिलती है, जो अपने काम के प्रति समर्पित थे और जिन्होंने अपने जीवन को समाज और पत्रकारिता के लिए समर्पित कर दिया था।

पुस्तक– ‘डॉ. धर्मवीर भारती की शख्सियत और पत्रकारिता’

संपादक– सुनील श्रीवास्तव, रविन्द्र श्रीवास्तव, टिल्लन रिछारिया

प्रकाशक – साहित्य विमर्श प्रकाशन, गुरुग्राम, हरियाणा ( सन 2025)

डॉ. सीमान्त प्रियदर्शी @कॉपीराइट

( लेखक एवं समीक्षक )

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!