
ये शरीर भी मिट्टी का खिलौना है,
आज हँसता है, कल रोना है।
साँसों की डोर ज़रा सी कच्ची,
पल में आना, पल में जाना है।
कभी धूप कड़ी, कभी छाया,
यही तो जीवन का आना–जाना है।
कभी शिखर पर, कभी गहराई,
हर मोड़ ने कुछ सिखलाना है।
सपनों की सेज सजी आँखों में,
टूटे तो दिल को समझाना है।
हार के आँसू, जीत की हँसी,
इन दोनों को ही अपनाना है।
मिलना बिछुड़ना,सुख दुख सारे,
पल भर का ये अफ़साना है।
कल क्या होगा, कौन है जाने,
आज को ही बस अपनाना है।
घमंड न कर इस तन–बल का,
ये सब मिट्टी में मिल जाना है।
नाम नहीं, काम ही साथ चले,
बाक़ी सब रह जाना है।
चल मुसाफ़िर, चलते रहना,
रुकना तेरा ठिकाना नहीं।
लय में गा ले जीवन का गीत,
ये खेल पुराना, पुराना सही,
पर हर पल नया तराना है।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




