
नीले गगन की गोद में, खोई सी एक कहानी है,
सूने आँगन की खामोशी में, गौरैया की निशानी है।
कभी छज्जों की रानी थी, हर घर की मुस्कान बनी,
आज उसी की चहक सुनने को, तरसती हर जुबानी है।
हमने ऊँची दीवारें खड़ी की, काँच-सी दुनिया बसाई,
उसकी छोटी सी दुनिया पर, ये कैसी मेहरबानी है?
ना पेड़ों की ठंडी छाया, ना मिट्टी का वो अपनापन,
हर कोना जैसे पूछ रहा—कहाँ गई वो मनमानी है?
एक दाना, एक बूँद जल, क्या इतना भी मुश्किल है?
इसी में तो उसकी साँसों की पूरी जिंदगानी है।
जब वो फुदक-फुदक कर आती है, जीवन रंगीन बनाती है,
उसकी हर इक चहक में छुपी, प्रकृति की अमृत वाणी है।
आओ फिर से रिश्ता जोड़ें, इस नन्हीं सी जान से,
उसके संग ही तो धरती की हरियाली सुहानी है।
छत पर रख दो प्यार की थाली, मन में थोड़ी ममता भर लो,
गौरैया बचेगी तो ही ये सृष्टि भी मुस्कानी है।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




