
रिश्तों की नींव जब से झूँठ पर खड़ी होने लगी।
परिवार बसने से पहले टूटने की झड़ी लगने लगी।।
एकल परिवार में आपसी समझ की कमी होने लगी।
पैसे कमाने की होड़ में बर्बाद पीढियां होने लगी।।
मानवता भूल गए लोग स्वार्थ की आंधी चलने लगी।।
जीवन मूल्यों को भूल अपने भले की बात होने लगी।।
डिजिटल युग में मोबाइल पर उंगलियां चलने लगी।
और कामयाबी जैसे हाथ से फिसलने लवी।।
देश में महंगाई सुरसा के मुख सी जब से बढ़ने लगी।
गरीब को दो जून की रोटी की चिंता सताने लगी।।
-डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
कवि,साहित्यकार
भवानीमंडी राजस्थान



